बेनाग्राम : तीन दशक बाद भी वीरान “भूतों का गाँव” ज़िंदा यादें छोड़ गया

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आसनसोल :  पश्चिम बर्दवान ज़िले के आसनसोल से सटे बेनाग्राम गाँव की कहानी आज भी रहस्य और रोमांच से भरी हुई है। एक समय यह गाँव अपनी रौनक और मेहनतकश लोगों के लिए जाना जाता था, लेकिन 1994 में एक ही रात में लगभग 150 परिवारों ने अपने घर छोड़ दिए। लोग घरों का सामान तक नहीं ले जा पाए। धीरे-धीरे गाँव सुनसान हो गया और समय के साथ इसे “भूतों का गाँव” कहा जाने लगा।

लक्ष्मी पूजा पर एक दिन के लिए लौटती है ज़िंदगी
दिलचस्प बात यह है कि साल में केवल एक बार, लक्ष्मी पूजा के दिन यह गाँव फिर से जीवंत हो उठता है। जो परिवार कभी यहाँ रहते थे, वे इस दिन अपने पुराने घरों में आते हैं, सफाई करते हैं और माँ लक्ष्मी के प्राचीन मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। रातभर भक्ति संगीत, भंडारा और दीपों की रोशनी से गाँव जगमगाता रहता है। लेकिन जैसे ही सुबह की पहली किरण पड़ती है, लोग लौट जाते हैं और गाँव फिर से अपने सन्नाटे में डूब जाता है।

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अफवाहें बनीं डर का कारण, पर असली वजह कुछ और थी
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि बेनाग्राम के खाली होने की असली वजह “भूत-प्रेत” नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की कमी थी। उस समय गाँव में न बिजली थी, न पीने का साफ पानी। ऊपर से पास से गुजरती रेलवे लाइन अक्सर हादसों का कारण बनती थी। कुछ आत्महत्या और दुर्घटनाओं की घटनाओं के बाद अफवाह फैल गई कि गाँव में “भूत” बसते हैं। इसी डर ने लोगों को अपना पैतृक घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि इस डर का फायदा कुछ असामाजिक तत्वों ने उठाया। उन्होंने धीरे-धीरे खाली पड़े घरों की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिशें शुरू कर दीं। इसीलिए कई परिवारों ने पूरी तरह से गाँव से दूरी बना ली।

अब हालात बदल रहे हैं, उम्मीदें फिर जगीं
तीन दशक बाद अब प्रशासन ने गाँव को फिर से बसाने की पहल शुरू की है। हाल के वर्षों में यहाँ बिजली के खंभे और ट्रांसफॉर्मर लगाए जा चुके हैं। रेलवे विभाग ने ट्रैक के किनारे बाउंड्री वॉल भी बना दी है ताकि कोई हादसा न हो। अब केवल स्वच्छ पेयजल आपूर्ति की कमी बनी हुई है।

गाँव के कुछ मूल निवासियों ने बताया कि अगर पानी की व्यवस्था हो जाए तो वे अपने घर लौटने को तैयार हैं। स्थानीय सामाजिक संगठनों ने भी जिला प्रशासन से गाँव के पुनर्वास की मांग की है।

रहस्य और डर की छाया के बीच उम्मीद की किरण
हालाँकि अब बेनाग्राम में “भूतों का डर” बहुत हद तक खत्म हो चुका है, लेकिन उसकी कहानियाँ आज भी आसनसोल और आसपास के लोगों की बातचीत में मौजूद हैं। शाम ढलते ही यह गाँव फिर अपने पुराने रूप में लौट जाता है — शांत, निर्जन और रहस्यमय।

स्थानीय पंचायत सदस्य संजय राय का कहना है, “यह गाँव आज भी अपने लोगों की प्रतीक्षा कर रहा है। अगर सरकार थोड़ी मदद करे तो बेनाग्राम फिर से बस सकता है।”

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सवाल वही पुराना है — क्या कभी यह गाँव फिर से आबाद होगा?
एक तरफ अंधविश्वास की परछाई, दूसरी तरफ विकास की उम्मीद — बेनाग्राम इन दोनों के बीच अटका हुआ है। लेकिन अब जब बिजली और सुरक्षा की व्यवस्था हो चुकी है, तो लोगों की उम्मीदें फिर से जाग रही हैं। हो सकता है कि आने वाले कुछ वर्षों में यह “भूतों का गाँव” एक बार फिर हँसी-खुशी के जीवन से गूंज उठे।

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