
आसनसोल (नियामतपुर) : पश्चिम बर्धमान जिले के नियामतपुर गांव में मां काली की आराधना से जुड़ी एक ऐसी परंपरा आज भी जीवित है, जो छह सदियों से लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि रहस्य, श्रद्धा और तंत्र साधना का संगम है। यहां की आदि काली पूजा का इतिहास लगभग 600 वर्ष पुराना माना जाता है, और इसकी विशिष्टता है — पंचमुण्ड की वेदी पर मां की स्थापना, जो पूरे भारत में विरले ही देखने को मिलती है।
खुले आकाश के नीचे जागृत होती है मां की शक्ति
नियामतपुर कालीबाड़ी में हर साल दीपावली की रात विशेष पूजा-अर्चना होती है। कहा जाता है कि इस रात मां काली की दिव्य उपस्थिति इतनी तीव्र होती है कि मंदिर परिसर में स्वयं देवी के नूपुरों और जंजीरों की आवाजें सुनाई देती हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह ध्वनि मां के प्रकट होने और उनके आशीर्वाद का संकेत है।

कहते हैं मां को जंजीरों से बांधा जाता है
गांव के वरिष्ठ पुजारी भोलानाथ पंडा बताते हैं — “काली पूजा की रात मां की शक्ति इतनी प्रचंड होती है कि उन्हें जंजीरों से बांधना पड़ता है, वरना उनकी ऊर्जा पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएगी।” यही कारण है कि इस रात मंदिर में कुछ सीमित लोग ही प्रवेश कर पाते हैं। पूजा के दौरान गुप्त तंत्र साधना की जाती है, जिसे बाहर के लोगों को दिखाया नहीं जाता।
शेरशाह सूरी के काल से आरंभ हुई परंपरा
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह पूजा शेरशाह सूरी के शासनकाल (16वीं सदी) में प्रारंभ हुई थी। तब से लेकर आज तक हर वर्ष अमावस्या की रात मां की पूजा निर्बाध रूप से की जाती है। कहा जाता है कि नियामतपुर की बसावट भी इस काली मंदिर के आसपास ही आरंभ हुई थी। इसीलिए यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।
पंचमुण्ड की वेदी का तांत्रिक महत्व
मां काली की मूर्ति जिस पंचमुण्ड वेदी पर स्थापित है, वह पांच मानव खोपड़ियों का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व करती है — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इंद्र और यम। यह तंत्र साधना की सर्वोच्च अवस्था का प्रतीक माना जाता है, जो मृत्यु पर विजय और अज्ञान के विनाश का प्रतीक है। स्थानीय साधकों के अनुसार, यहां वर्षों पहले महान तांत्रिकों ने साधना की थी, जिनकी तपस्या के कारण यह स्थान सिद्धपीठ बन गया।
भक्ति और परंपरा का महापर्व
काली पूजा की रात नियामतपुर गांव में भक्ति का सागर उमड़ पड़ता है। दूर-दराज़ से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। पूरा गांव दीपों की रोशनी में नहाया रहता है। मंदिर परिसर में ढोल-नगाड़े, भजन-कीर्तन और भोग वितरण के साथ पूजा सम्पन्न होती है। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में मां के गीत गाती हैं और युवा वर्ग आयोजन की व्यवस्था संभालता है।

रहस्य या विश्वास — आज भी कायम है चमत्कार की आभा
पूजा के बाद कई श्रद्धालु दावा करते हैं कि उन्होंने रात के सन्नाटे में पायल की रुनझुन और जंजीरों की खनक सुनी है। वैज्ञानिक कारणों की खोज आज तक नहीं हो सकी, परंतु स्थानीय लोग इसे मां की चेतन उपस्थिति का प्रमाण मानते हैं। उनका विश्वास है — “मां नियामतपुर की रक्षक हैं, और जब तक उनकी पूजा होती रहेगी, गांव पर कोई संकट नहीं आएगा।”
आस्था का अद्भुत केंद्र बना नियामतपुर कालीबाड़ी
आज नियामतपुर का कालीबाड़ी मंदिर न केवल बंगाल बल्कि झारखंड और बिहार के श्रद्धालुओं के बीच भी प्रसिद्ध है। यहां हर वर्ष हजारों भक्त देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भले ही यह पूजा रहस्य से घिरी हो, लेकिन यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्ची श्रद्धा के लिए मूर्ति या भव्य मंदिर नहीं, बल्कि आस्था की लौ जरूरी होती है।
नियामतपुर की यह आदि काली पूजा अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि उस अमर विश्वास की कहानी है जो हर युग में भक्त और देवी के बीच अटूट संबंध को जीवित रखती है।














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