वोटर सूची पुनरीक्षण में लापरवाही पर 600 बीएलओ को नोटिस

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कोलकाता : पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर चुनावी सरगर्मी के बीच विवाद भी तेज हो गया है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय ने करीब 600 बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। ये अधिकारी या तो काम से किनारा कर चुके हैं या नियुक्ति स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, आयोग ने संबंधित बीएलओ से यह स्पष्ट करने को कहा है कि वे मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्य से क्यों हटना चाहते हैं। उन्हें 72 घंटे के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है। राज्य भर में यह मामला शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों के बीच चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि बीएलओ के रूप में अधिकतर शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है।

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मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने बताया कि कई जिलों से प्राप्त रिपोर्टों में यह सामने आया कि कुछ शिक्षक-शिक्षिकाएं बीएलओ के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभाने से हिचकिचा रहे हैं। जिला निर्वाचन अधिकारियों ने उनकी शिकायतें मुख्यालय को भेजी हैं। इसके बाद सीईओ कार्यालय ने सभी संबंधित बीएलओ को औपचारिक नोटिस जारी किया है।

चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के इस गहन पुनरीक्षण कार्य के तहत 2002 की एसआईआर लिस्ट की तुलना मौजूदा वोटर सूची से की जा रही है। इसे “मैपिंग प्रक्रिया” कहा जाता है, जिसमें हर बूथ का भौगोलिक और जनसांख्यिकीय सत्यापन किया जा रहा है। आयोग चाहता है कि नवंबर तक सभी जिलों में यह प्रक्रिया पूरी कर ली जाए ताकि आगामी लोकसभा उपचुनावों और अगले वर्ष के पंचायत चुनावों के लिए अद्यतन मतदाता सूची तैयार की जा सके।

बीएलओ की अनिच्छा को लेकर आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “मतदाता सूची पुनरीक्षण चुनावी प्रक्रिया का सबसे अहम चरण है। यदि इस स्तर पर कोई लापरवाही होती है, तो उसका असर सीधे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पड़ता है। इसलिए जो बीएलओ अपने कर्तव्यों से बच रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई तय है।”

बिहार में इसी तरह की एसआईआर प्रक्रिया पहले ही पूरी की जा चुकी है, जिसके बाद वहां विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई। अब पश्चिम बंगाल में भी आयोग उसी मॉडल को लागू कर रहा है। सीईओ कार्यालय ने जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि किसी भी बीएलओ की जगह खाली न रहे और सभी पदों पर वैकल्पिक अधिकारियों की तत्काल नियुक्ति की जाए।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीएलओ की यह अनिच्छा केवल कार्यभार या दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि आगामी चुनावों को लेकर प्रशासनिक सतर्कता की कमी भी दर्शाती है। वहीं, कई शिक्षक संगठनों ने यह तर्क दिया है कि शिक्षकों को एक साथ शिक्षण कार्य, सर्वेक्षण और निर्वाचन कार्य सौंपे जाने से उन पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

हालांकि, आयोग ने साफ कर दिया है कि किसी भी परिस्थिति में एसआईआर प्रक्रिया में ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। चुनावी तैयारियों के बीच अब यह देखना होगा कि नोटिस मिलने के बाद बीएलओ अपने रुख में कितना बदलाव लाते हैं।

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