
आसनसोल : शहर में निवेश प्रलोभन के नाम पर हुए कथित 350 करोड़ रुपये के बड़े वित्तीय घोटाले ने शुक्रवार को नया मोड़ ले लिया है। मुख्य आरोपी तहसीन अहमद की गिरफ्तारी के बाद अब उसके संपर्क में रहे कई एजेंट अचानक भूमिगत बताए जा रहे हैं। पुलिस ने इनकी तलाश तेज कर दी है, जबकि पीड़ित परिवार रोजाना पुलिस थानों और प्रशासनिक कार्यालयों का चक्कर काट रहे हैं।
इस प्रकरण ने एक बार फिर चिटफंड जैसी धोखाधड़ी योजनाओं की भयावहता उजागर कर दी है, जिनसे हजारों लोग बरसों की कमाई गंवा चुके हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार अब तक दो हजार से अधिक निवेशकों की पहचान हो चुकी है, जिन्होंने करीब 50 करोड़ रुपये डाल दिए थे। पीड़ितों का कहना है कि उनके पैसे जीवनभर की कमाई, पेंशन बचत, खेती-बाड़ी से अर्जित पूंजी और बच्चों की शादी के लिए रखे धन में से थे।
घोटाले का पर्दाफ़ाश तब हुआ जब एक स्थानीय नागरिक ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायतकर्ता ने पहले तीन लाख रुपये जमा किए, जिस पर माहवार आकर्षक रिटर्न मिला। इसी भरोसे बृहद राशि, तकरीबन 41 लाख रुपये और दे दिए गए। किन्तु इसके बाद भुगतान पूरी तरह बंद हो गया। पीड़ितों का कहना है कि “पहले कुछ महीनों तक लौटाव नियमित मिला, जिससे भरोसा बैठ गया। बाद में अचानक बहाना बनाकर पैसे देना बंद कर दिया।”

पुलिस का दावा है कि बिना किसी अधिकृत लाइसेंस वाली निजी इकाई चलाकर लोगों को 14 प्रतिशत मासिक ब्याज का झांसा दिया गया। इस लालच में पड़कर बड़ी संख्या में लोग निवेश करने लगे। आरोपी 20 अक्टूबर को फरार हो गया था, जिसके बाद स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ी और कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन भी हुए। आखिरकार 26 अक्टूबर को पुलिस ने उसे दबोच लिया और उसके पास से भारी मात्रा में सोना बरामद किया गया। अदालत ने उसे दस दिन की पुलिस रिमांड में भेजा है।
रिमांड के दौरान कई अहम सुराग मिलने की बात सामने आई है। सूत्र बताते हैं कि तहसीन के एजेंट आसनसोल के रेलपार, जहांगीरी मोहल्ला और आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय थे और लोगों को विश्वास में लेकर निवेश कराने का काम करते थे। फिलहाल ये एजेंटों के अचानक गायब होने से संदेह गहरा गया है कि मामले की जड़ें अपेक्षा से अधिक विस्तृत हो सकती हैं।
राजनीति ने भी इस मुद्दे पर जोर पकड़ लिया है। सत्ताधारी दल के स्थानीय नेताओं ने मामले से दूरी बनाते हुए कहा कि आरोपी और उसके परिवार का पार्टी से किसी प्रकार का वर्तमान संबंध नहीं है। दूसरी ओर विपक्ष ने इसे सत्ता संरक्षण प्राप्त आर्थिक अपराध बताते हुए सवाल उठाए हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि वर्षों से यह धोखाधड़ी चल रही थी और प्रशासन की अनदेखी से ही इतनी बड़ी रकम जुटाई जा सकी।

इस बीच वित्तीय अपराध विभाग और साइबर इकाई भी जांच में जुटी है। पुलिस का दावा है कि जल्द ही शेष आरोपियों को भी पकड़ लिया जाएगा। पीड़ितों से भी अपील की गई है कि वे थाने में अपनी शिकायत दर्ज कराएं, ताकि नुकसान का आकलन स्पष्ट हो सके।
इस मामले ने शहरवासियों को चेताया है कि ऊंचे ब्याज और तेज़ मुनाफे का लालच अक्सर बड़े नुकसान का कारण बनता है। विशेषज्ञों ने कहा है कि किसी भी प्रकार की निवेश योजना में उतरने से पहले उसकी वैधता, पंजीकरण और वित्तीय साख की जांच करना अत्यंत आवश्यक है।
फिलहाल आसनसोल में लोग इस घटनाक्रम से स्तब्ध हैं और उम्मीद लगाए बैठे हैं कि जांच आगे बढ़कर उन्हें उनका धन वापस दिलाएगी। परंतु अनुभव यही बताता है कि ऐसे मामलों में न्याय और राशि वसूली लंबे समय की प्रक्रिया होती है। इसलिए प्रशासनिक सक्रियता और पीड़ितों की कानूनी सहायता के विस्तार की मांग भी जोर पकड़ने लगी है।














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