
आसनसोल : नगर निगम स्वामित्व वाले सामुदायिक केंद्र को लेकर मंगलवार को शहर की राजनीति गर्मा गई। वार्ड संख्या 23 स्थित शगुन मैरिज हॉल के हस्तांतरण को लेकर पार्षद और निगम प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बन गई। घटना के बाद आज मेयर विधान उपाध्याय ने कड़े शब्दों में पार्षद सीके रेशमा के व्यवहार पर आपत्ति जताते हुए स्पष्ट कहा कि नगर निगम की संपत्ति को किसी भी जनप्रतिनिधि की निजी जागीर समझना गलत है।
मेयर ने बताया कि संबंधित मैरिज हॉल नगर निगम द्वारा बनाए गए सार्वजनिक ढांचे का हिस्सा है, जिसका संचालन टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से तय किया गया है। निगम अधिकारियों की टीम, नियमों के अनुसार, टेंडर जीतने वाली संस्था को प्रबंधन सौंपने पहुंची थी। इसी दौरान वार्ड की पार्षद द्वारा आपत्ति जताते हुए प्रक्रिया को रोकने का प्रयास किया गया।

मेयर उपाध्याय ने कहा कि सरकारी धन से निर्मित संपत्तियाँ जनता की होती हैं, न कि किसी भी राजनीतिक पदधारी की निजी संपत्ति। यदि टेंडर के माध्यम से अधिक राजस्व निगम को मिलता है, तो यही शहर के विकास के लिए उपयुक्त है। उन्होंने कहा कि पूर्व में इस केंद्र से निगम को एक लाख रुपये से कुछ अधिक की वार्षिक राशि प्राप्त होती थी, जबकि नई व्यवस्था में यह राशि बढ़कर आठ लाख रुपये से ज्यादा हो जाएगी। ऐसे में पारदर्शी प्रक्रिया को बाधित करना जनहित के खिलाफ है।

मेयर ने यह भी आरोप लगाया कि पार्षद का उद्देश्य केंद्र से अधिकतम लाभ कमाना था, जिसके चलते हस्तांतरण का विरोध किया गया। उन्होंने कहा कि यदि टेंडर प्रक्रिया पर सवाल हैं, तो उसके समाधान का लोकतांत्रिक और वैधानिक तरीका उपलब्ध है। सड़क पर प्रशासनिक कार्यों को रोकना किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं होगा।
उन्होंने आगे कहा कि पार्षद को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि केंद्र के टेंडर में उनका नाम दूसरे स्थान पर कैसे आया, और पास ही स्थित दूसरे सामुदायिक केंद्र का टेंडर उनके पक्ष में कैसे निकला। ऐसी स्थिति में पारदर्शिता पर प्रश्न उठाना उचित नहीं कहा जा सकता।
मेयर उपाध्याय ने कहा कि नगर निगम हमेशा ऐसे ही प्रबंधक को चुनेगा, जो अधिक राजस्व दे सके और जिसकी नीयत सार्वजनिक संसाधनों के सही उपयोग को लेकर स्पष्ट हो। उन्होंने कहा कि निगम अधिकारियों को कार्य निष्पादन से रोकना गंभीर मामला है और इस संबंध में पार्षद के विरुद्ध व्यक्तिगत रूप से प्राथमिकी दर्ज की जाएगी।
उन्होंने कहा कि नगर निगम टीम अपने अधिकार क्षेत्र और नियमों का पालन करते हुए कार्य कर रही थी। ऐसे में किसी जनप्रतिनिधि द्वारा संचालन रोके जाने से न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया प्रभावित हुई, बल्कि शहर में गलत संदेश भी गया।

घटना के बाद क्षेत्र में चर्चा का माहौल है। नागरिकों का एक पक्ष निगम प्रशासन के निर्णय को सही मानते हुए राजस्व वृद्धि का स्वागत कर रहा है, वहीं दूसरा पक्ष पार्षद के समर्थन में यह तर्क दे रहा है कि स्थानीय लोगों की सहमति और सुविधा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
हालांकि, नगर निगम सूत्रों के अनुसार, टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रही है और इसमें सभी पात्र संस्थाओं को भाग लेने का अवसर दिया गया था। मामला अब राजनीतिक तकरार की दिशा लेता दिख रहा है। आने वाले दिनों में इस विवाद से जुड़े घटनाक्रम और तेज होने की संभावना है।
नगर निगम प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक हित सर्वोपरि रहेगा और किसी भी प्रकार की गैरकानूनी अथवा दबाव आधारित गतिविधि को स्वीकार नहीं किया जाएगा। फैसले का अंतिम उद्देश्य शहर के संसाधनों का बेहतर उपयोग और नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं प्रदान करना है।














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