
दुर्गापुर : ओडिशा निवासी मेडिकल छात्रा के साथ हुए कथित उत्पीड़न मामले में सोमवार को दुर्गापुर की विशेष अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने इस सनसनीखेज मामले के छह आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करते हुए उन्हें पुनः जेल भेजने का आदेश दिया। न्यायाधीश लोकेश पाठक की अदालत में हुई इस सुनवाई को मामले की दिशा में एक बड़ी प्रगति माना जा रहा है।
अदालत ने कहा कि अब मामले की सुनवाई नियमित रूप से की जाएगी। सरकारी पक्ष के वकील बिभास चटर्जी ने बताया कि 19 नवंबर से इस केस में गवाहों की गवाही की प्रक्रिया शुरू होगी। मंगलवार को वह अदालत के समक्ष गवाहों की पूरी सूची पेश करेंगे।
यह मामला 10 अक्टूबर की रात का है, जब दुर्गापुर स्थित एक निजी मेडिकल कॉलेज की छात्रा को उसके सहपाठियों और अन्य युवकों ने कथित रूप से प्रताड़ित किया था। घटना के बाद पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने महज 20 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल कर दी।
पुलिस जांच के अनुसार, इस प्रकरण में बिजरा गांव के निवासी फिरदौस शेख, रियाजुद्दीन शेख, अपू बाउरी, नसीरुद्दीन शेख, शफीक शेख और वासिफ अली को आरोपी बनाया गया था। वासिफ अली, जो पीड़िता का सहपाठी है, सीलमपुर का निवासी बताया गया है।

सोमवार को अदालत में सबसे पहले वासिफ अली की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। उसके अधिवक्ता शेखर कुंडू ने अदालत में तर्क दिया कि “बलात्कार के आरोप का समर्थन करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं।” उन्होंने दावा किया कि जांच अधूरी है और केवल अनुमान के आधार पर उनके मुवक्किल को फंसाया गया है।
हालांकि, सरकारी वकील बिभास चटर्जी ने इस दलील का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि “पुलिस द्वारा दर्ज किए गए बयान और बरामद साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि घटना के समय वासिफ घटनास्थल पर मौजूद था।”
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायाधीश लोकेश पाठक ने वासिफ अली की जमानत याचिका खारिज कर दी और सभी आरोपियों पर औपचारिक रूप से आरोप तय करने का आदेश सुनाया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी अभियुक्तों को पुनः न्यायिक हिरासत में भेजा जाए।
सूत्रों के अनुसार, इस मामले की जांच के दौरान दो आरोपी — रियाजुद्दीन शेख और शफीक शेख — ने प्रारंभिक स्तर पर मजिस्ट्रेट के सामने गोपनीय बयान (सेक्शन 164) दर्ज कराया था। उस समय ऐसा माना जा रहा था कि वे शाही गवाह बनने को तैयार हैं। लेकिन बाद में दोनों ने अपने बयान वापस ले लिए, जिससे जांच एजेंसियों को नयी चुनौती मिली।
इस बीच, पीड़िता की सुरक्षा को लेकर भी पुलिस प्रशासन सतर्क है। दुर्गापुर उप-मंडल पुलिस अधिकारी के निर्देशन में पीड़िता के आवास पर विशेष निगरानी की जा रही है। वहीं, कॉलेज प्रशासन ने भी आंतरिक जांच समिति गठित की है, जो यह देखेगी कि इस घटना के दौरान कॉलेज के छात्र-छात्राओं की भूमिका क्या रही।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने निर्देश दिया है कि सुनवाई के दौरान मीडिया रिपोर्टिंग जिम्मेदारी से की जाए, ताकि गवाहों या पीड़िता पर किसी तरह का दबाव न बने।

वहीं, पीड़िता के परिवार ने अदालत के आदेश पर संतोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि “कई दिनों की प्रतीक्षा के बाद अब न्याय की दिशा में वास्तविक कदम बढ़ा है।”
सरकारी वकील ने उम्मीद जताई कि “19 नवंबर से शुरू होने वाली गवाही के दौरान सच सबके सामने आ जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार इस पूरे मामले को फास्ट-ट्रैक कोर्ट में लाने पर विचार कर रही है, ताकि पीड़िता को शीघ्र न्याय मिल सके।
इस मामले ने पश्चिम बर्धमान और दुर्गापुर के मेडिकल समुदाय में हलचल मचा दी है। छात्र संगठनों और महिला अधिकार समूहों ने भी अदालत के निर्णय का स्वागत किया और कहा कि “ऐसे मामलों में त्वरित न्याय ही समाज के लिए मिसाल बन सकता है।”














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