आसनसोल : रेलवे में मंत्री कोटे के नाम पर नौकरी दिलाने के बहाने युवाओं से लाखों रुपये ठगने के लगभग तेरह वर्ष पुराने बहुचर्चित प्रकरण में आसनसोल स्थित विशेष सीबीआई न्यायालय ने अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेज़ों, साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर न्यायाधीश अरिंदम चटर्जी ने दो आरोपितों — तत्कालीन रेलवे कर्मचारी शंभूनाथ सरकार तथा उसके सहयोगी मो. रियाज़ — को दोषी मानते हुए सजा निर्धारित की।

प्रकरण के अनुसार, वर्ष 2011 में आरोपित शंभूनाथ सरकार ईस्टर्न रेलवे के आसनसोल मंडल में डीआरएम कार्यालय में ऑफिस सुपरिटेंडेंट (ओएसएस) के पद पर कार्यरत था। उसके साथ रहने वाला मो. रियाज़ पेशे से ऑटो-रिक्शा चालक था, किंतु कथित रूप से उसके साथ इस आर्थिक छल योजना में शामिल रहा। आरोप है कि दोनों ने राजस्थान के विभिन्न जिलों से आए नौ युवकों को यह विश्वास दिलाया कि मंत्रिस्तरीय कोटे के तहत रेलवे में स्थायी नौकरी उपलब्ध करवाई जा सकेगी। इसी झूठे आश्वासन के आधार पर लगभग 62 लाख रुपये उनसे वसूले गए।
शिकायत और जांच प्रक्रिया
पैसा दिए जाने के बाद कई महीनों तक न तो कोई नियुक्ति पत्र मिला और न ही किसी सरकारी विभाग से संबंधित पुष्टि। लगातार इंतजार और संदेह बढ़ने पर पीड़ित युवकों ने इस पूरे प्रकरण की शिकायत सीबीआई से की। शिकायत के आधार पर औपचारिक मामला दर्ज हुआ और विस्तृत जांच आगे बढ़ी।
जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि ठगी की पूरी राशि मो. रियाज़ के बैंक खाते में जमा कराई गई थी। सीबीआई ने बैंक रिकॉर्ड, फोन रिकॉर्ड और गवाहों के बयान न्यायालय में प्रस्तुत किए। इस दौरान कुल 19 गवाहों ने अदालत में बयान दिया, जिन्होंने आरोप सिद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मामले में सीबीआई की ओर से राकेश कुमार विशेष लोक अभियोजक के रूप में पेश हुए।

न्यायालय का निर्णय
गहन सुनवाई और तर्क-वितर्क के पश्चात न्यायालय ने शुक्रवार को अंतिम आदेश जारी किया। इसके तहत: शंभूनाथ सरकार को तीन वर्ष का कठोर कारावास एवं 30,000 रुपये का अर्थदंड दिया गया। मो. रियाज़ को एक वर्ष का कारावास एवं 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।न्यायालय ने अपने आदेश में यह कहा कि सरकारी नौकरी जैसे संवेदनशील विषय पर नागरिकों से विश्वासघात करना गंभीर अपराध है, क्योंकि इससे न केवल आर्थिक क्षति होती है बल्कि युवाओं के भविष्य और विश्वास को भी आघात पहुँचता है।
जमानत पर राहत, पर मामला रहेगा दर्ज
अदालत सूत्रों के अनुसार, चूंकि दोनों आरोपितों को निर्धारित सजा तीन वर्ष एवं एक वर्ष से अधिक नहीं है, इसलिए कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत उन्हें उसी दिन जमानत प्रदान कर दी गई। हालांकि, दंडादेश दर्ज रहेगा और उच्च न्यायालय में अपील लंबित रहने तक सजा स्थगन की प्रक्रिया कानून के अनुसार चलेगी।

संदेश और चेतावनी
इस निर्णय को कई कानूनी विशेषज्ञों ने प्रशासनिक स्वच्छता और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था की मिसाल बताया है। साथ ही यह भी संदेश दिया गया है कि सरकारी नौकरी के नाम पर पैसे लेकर धोखाधड़ी करने वालों को कानून किसी भी स्थिति में संरक्षण नहीं देगा।
प्रशासनिक अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि सरकारी नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी होती है और किसी भी प्रकार का धन भुगतान या सिफारिश वैध नहीं। यदि ऐसी कोई मांग होती है तो तुरंत संबंधित विभाग अथवा जांच एजेंसी को सूचित किया जाए।
इस फैसले के साथ न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि “रोजगार और भविष्य की आशा से खिलवाड़ करने वाले अपराधी किसी भी प्रकार की ढिलाई के पात्र नहीं।”














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