आसनसोल : शनिवार को देश के कोयला क्षेत्र से जुड़ी एक अहम नीति ने औद्योगिक और खनन क्षेत्रों में नई बहस छेड़ दी है। केंद्र सरकार ने कोयला आपूर्ति व्यवस्था में व्यापक सुधार की दिशा में कदम बढ़ाते हुए CoalSETU (कोल सेतु) नीति को मंजूरी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में इस नई विंडो को हरी झंडी मिलने के बाद इसे कोयला लिंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता लाने की बड़ी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, सवाल यही है कि क्या यह पहल जमीनी स्तर पर कोयला तस्करी और अव्यवस्था पर वास्तव में प्रभावी साबित होगी?

क्या है ‘कोलसेतु’ का उद्देश्य
कोलसेतु का मूल उद्देश्य कोयला लिंकेज की नीलामी को अधिक सरल, पारदर्शी और प्रभावी बनाना है। इसके तहत गैर-विनियमित क्षेत्रों के लिए कोयला लिंकेज नीति में एक अलग व्यवस्था जोड़ी गई है, जिससे उद्योगों को कोयले की सुनिश्चित आपूर्ति मिल सके। सरकार का दावा है कि इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और कोयला आपूर्ति शृंखला में व्याप्त गड़बड़ियों पर रोक लगेगी।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शनिवार को जानकारी देते हुए कहा कि इस नई व्यवस्था में कोई भी घरेलू खरीदार नीलामी प्रक्रिया में भाग ले सकता है। कोयला लिंकेज धारकों को अपनी आपूर्ति का 50 प्रतिशत तक निर्यात करने की अनुमति होगी, जबकि व्यापारियों को जानबूझकर इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया है, ताकि सट्टेबाजी और कालाबाजारी को रोका जा सके।
आत्मनिर्भरता का दावा, आंकड़ों का सहारा
सरकार का तर्क है कि भारत कोयला उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। वर्ष 2024-25 में देश ने रिकॉर्ड एक अरब टन से अधिक कोयले का उत्पादन किया, जिससे आयात पर निर्भरता काफी हद तक कम हुई है। इसके चलते देश को लगभग 60 हजार करोड़ रुपये की बचत हुई है। नीति-निर्माताओं के अनुसार, यही समय है जब घरेलू कोयला भंडारों का बेहतर प्रबंधन और निर्यात की संभावनाओं पर काम किया जाए।
ईसीएल-बीसीसीएल और जमीनी सच्चाई
लेकिन नीति की घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब कोल इंडिया की प्रमुख सहायक कंपनियां—ईसीएल और बीसीसीएल—कोयला तस्करी और कथित भ्रष्ट तंत्र से जूझ रही हैं। ईसीएल क्षेत्र में अवैध खनन और सिंडिकेट का दबदबा किसी से छिपा नहीं है। स्थिति इतनी गंभीर है कि पिछले दो महीनों से कई कर्मचारियों और अधिकारियों को वेतन भुगतान में भी दिक्कतें सामने आई हैं।
यही कारण है कि शिल्पांचल और कोयला क्षेत्रों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या कोलसेतु केवल कागजी सुधार बनकर रह जाएगा, या वास्तव में उस तंत्र को तोड़ पाएगा, जो वर्षों से लिंकेज के नाम पर अवैध कारोबार को बढ़ावा देता आया है।
नीति की खास बातें
कोलसेतु व्यवस्था के तहत औद्योगिक उपयोग, कोल वॉशिंग, निर्यात या अन्य किसी उद्देश्य के लिए कोयला लिंकेज का इस्तेमाल किया जा सकेगा। हालांकि, घरेलू बाजार में दोबारा बिक्री की अनुमति नहीं होगी और कोकिंग कोयला इस नीति के दायरे से बाहर रहेगा। सरकार का मानना है कि इससे कोयले की अंतिम उपयोग पर अनावश्यक पाबंदियां खत्म होंगी और उद्योगों को लचीलापन मिलेगा।

‘खनन प्रहरी’ की विफलता की याद
शनिवार की चर्चा में एक पुरानी पहल का जिक्र भी अनिवार्य हो जाता है—‘खनन प्रहरी’ मोबाइल ऐप। वर्ष 2023 में बड़े उत्साह के साथ लॉन्च किया गया यह ऐप अवैध खनन और तस्करी की शिकायतों के लिए बनाया गया था। आम नागरिक फोटो, वीडियो और विवरण के साथ सीधे मंत्रालय तक शिकायत भेज सकते थे। पहचान गोपनीय रखने और ट्रैकिंग सुविधा के बावजूद आज यह ऐप लगभग निष्क्रिय माना जा रहा है। न तो इसका प्रचार हो रहा है, न ही इसके जरिए ठोस कार्रवाई की खबरें सामने आती हैं।
इतिहास गवाह है, सवाल भविष्य का
भारत में कोयला खनन की शुरुआत रानीगंज से हुई थी और इसका इतिहास दो सदियों से भी अधिक पुराना है। राष्ट्रीयकरण से लेकर निजीकरण और अब व्यावसायिक खनन तक, हर दौर में सुधारों के बड़े दावे किए गए। लेकिन हर नीति की सफलता इस बात पर निर्भर रही कि उसे कितनी ईमानदारी से लागू किया गया।
शनिवार को घोषित कोलसेतु नीति ने उम्मीद तो जगाई है, लेकिन शिल्पांचल जैसे क्षेत्रों में लोग अभी भी आशंकित हैं। उन्हें डर है कि कहीं यह पहल भी पुराने ढर्रे पर चलकर केवल कागजों में ही सिमट न जाए। असली परीक्षा अब नीति के अमल की है—जहां पारदर्शिता केवल शब्द न रहकर, जमीन पर दिखाई देनी चाहिए।















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