आसनसोल : शनिवार का शिल्पांचल आज केवल औद्योगिक पहचान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह रेत के इर्द-गिर्द खड़ी एक गहरी सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवीय त्रासदी का साक्षी बनता जा रहा है। कभी नदियों की कल-कल धारा, हरियाली और प्राकृतिक संतुलन के लिए पहचाने जाने वाले आसनसोल–दुर्गापुर क्षेत्र में आज ‘बालू’ सबसे कीमती वस्तु बन चुकी है—इतनी कीमती कि इंसानी जानें उसके नीचे दबती जा रही हैं।

रेत, जो सभ्यता की नींव को स्थिर रखने का काम करती है, वही आज शिल्पांचल में विनाश का कारण बनती दिख रही है। नदियों की गोद से अवैज्ञानिक तरीके से बालू की निकासी ने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है। नदी का प्रवाह बदला है, तट कमजोर हुए हैं और जमीन के नीचे से मानो जीवन खिसकता जा रहा है।
शिल्पांचल कभी ईश्वर की विशेष देन माना जाता था। चारों ओर वन क्षेत्र, कोयले की खदानें, जलस्रोत, तालाब और नदियों का जाल—इन सबने मिलकर इस क्षेत्र को समृद्ध बनाया। लेकिन समय के साथ इस समृद्धि पर ऐसी नजर पड़ी, जिसने विकास के नाम पर दोहन को ही नीति बना लिया। पहले यह लूट सीधे-सीधे दिखती थी, अब यह ‘सेवा’, ‘नियोजन’ और ‘विकास’ के शब्दों में ढकी हुई है।
शनिवार को जामुड़िया क्षेत्र में सामने आई घटना ने इस सच्चाई को फिर उजागर कर दिया। बालू से लदे वाहन की चपेट में आकर एक अधेड़ की मौत ने इलाके को उबाल पर ला दिया। गुस्साए लोगों ने सड़क पर उतरकर विरोध जताया। सवाल उठता है—गुस्सा पुलिस पर क्यों फूटा? जवाब भी उतना ही कड़वा है—क्योंकि लोगों को लगता है कि अगर व्यवस्था समय रहते जागती, तो शायद यह मौत टाली जा सकती थी।
यह कोई एक गांव या एक थाना क्षेत्र की कहानी नहीं है। शिल्पांचल का शायद ही कोई ऐसा इलाका बचा हो, जहां बालू कारोबार की गूंज न सुनाई दे। वैध और अवैध घाटों की बहस अपनी जगह है, लेकिन हकीकत यह है कि नदियों के बीच रास्ते बनाकर, पुलों के नीचे मशीनें उतारकर और गांवों के संकरे रास्तों से भारी वाहनों की आवाजाही किसी भी तरह से ‘वैध’ नहीं कही जा सकती।
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इस कारोबार को चलाने वाले लोग अक्सर स्थानीय ही होते हैं, लेकिन उन्हें जो अदृश्य संरक्षण मिलता है, वही उन्हें अजेय बना देता है। यह संरक्षण अस्थायी होता है—दो-तीन साल के लिए—लेकिन इसी सीमित समय में अधिकतम लाभ बटोरने की होड़ मच जाती है। परिणाम यह होता है कि नुकसान हमेशा स्थानीय समाज को झेलना पड़ता है, जबकि लाभ उठाने वाले आगे बढ़ जाते हैं।
अवैज्ञानिक खनन के दुष्परिणाम कोई नई बात नहीं हैं। वर्षों पहले भी विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों ने चेताया था कि नदियों की अनियंत्रित खुदाई जल परियोजनाओं और जनजीवन के लिए खतरा बन सकती है। लेकिन चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया। समय बीतने के साथ वही आशंकाएं हकीकत बनती चली गईं। नदियों ने अपने रास्ते बदले, जमीन धंसने लगी और जानलेवा हादसे बढ़ते चले गए।

शिल्पांचल में यह सवाल अब और तीखा हो गया है—क्या विकास का अर्थ केवल संसाधनों को खाली कर देना है? क्या नीति-निर्माण का उद्देश्य केवल कागजों पर संतुलन दिखाना रह गया है? और सबसे अहम—क्या आम नागरिक की जान की कोई कीमत नहीं रह गई?
शनिवार की घटनाएं केवल आक्रोश नहीं, बल्कि टूटते विश्वास की अभिव्यक्ति हैं। लोग यह महसूस करने लगे हैं कि व्यवस्था उनके साथ नहीं, बल्कि उस रेत के साथ खड़ी है, जो उनकी जमीन, उनके जल और उनके भविष्य को निगल रही है।
रेत से रिश्ता केवल कारोबार का नहीं होता, वह सभ्यता से जुड़ा होता है। अगर समय रहते इस रिश्ते को संभाला नहीं गया, तो शिल्पांचल की पहचान केवल उद्योगों से नहीं, बल्कि उजड़े गांवों, सूखी नदियों और असमय बुझती जिंदगियों से होगी। शनिवार का संकेत साफ है—अब अनदेखी की कीमत और ज्यादा भारी पड़ने वाली है।















Users Today : 9
Users Yesterday : 37