म्यूटेशन शुल्क पर सवाल, निगमों में दोहरे मापदंड क्यों लागू

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आसनसोल :  दक्षिण बंगाल के प्रमुख वाणिज्यिक संगठनों में शुमार फोसबेकी ने राज्य के नगर निकायों की नीतियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा किया है। संगठन के अध्यक्ष सचिन राय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब कोलकाता नगर निगम में संपत्ति म्यूटेशन पर किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जा रहा है, तब बंगाल के अन्य नगर निगमों और नगर पालिकाओं में नागरिकों से यह राशि क्यों वसूली जा रही है। उन्होंने इसे नीतिगत असमानता करार देते हुए आम नागरिकों और व्यापारिक वर्ग के साथ अन्याय बताया।

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सचिन राय ने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत के निर्देशों के आलोक में कोलकाता नगर निगम ने म्यूटेशन शुल्क लेना बंद कर दिया है। यह निर्णय न्यायिक आदेशों के अनुपालन और नागरिक हितों की रक्षा की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना गया। लेकिन आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इसी राज्य के अन्य नगर निकाय—जिनमें आसनसोल नगर निगम भी शामिल है—अब तक पुरानी व्यवस्था के तहत म्यूटेशन शुल्क वसूल रहे हैं। इससे न केवल भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है, बल्कि नागरिकों में असंतोष भी बढ़ रहा है।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कानून और न्यायिक आदेश पूरे राज्य के लिए समान हैं, तो उनके क्रियान्वयन में भेदभाव क्यों किया जा रहा है। क्या अलग-अलग नगर निगमों के लिए अलग कानून लागू हैं? या फिर यह प्रशासनिक उदासीनता और इच्छाशक्ति की कमी का परिणाम है? सचिन राय के अनुसार, म्यूटेशन जैसी अनिवार्य प्रक्रिया पर शुल्क लगाना आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने के समान है, खासकर तब, जब एक बड़े नगर निगम में यह पूरी तरह समाप्त किया जा चुका हो।

फोसबेकी अध्यक्ष ने यह भी जानकारी दी कि संगठन शीघ्र ही आसनसोल नगर निगम को एक औपचारिक पत्र सौंपेगा। इस पत्र के माध्यम से निगम प्रशासन से स्पष्ट जवाब मांगा जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी म्यूटेशन शुल्क वसूलने का आधार क्या है। संगठन यह जानना चाहता है कि क्या इस संबंध में कोई वैधानिक बाध्यता है या फिर केवल परंपरागत प्रक्रिया के नाम पर शुल्क लिया जा रहा है।

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व्यापारिक संगठनों और संपत्ति स्वामियों का मानना है कि म्यूटेशन शुल्क समाप्त होने से न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि संपत्ति संबंधी प्रक्रियाएं भी सरल होंगी। इससे नगर निगमों के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत होगा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में एकरूपता आएगी। सचिन राय ने कहा कि फोसबेकी किसी टकराव की राजनीति नहीं चाहता, बल्कि संवाद के माध्यम से समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि नगर निगम स्तर पर संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता है, तो संगठन राज्य सरकार और आवश्यक होने पर न्यायिक मंच का दरवाजा भी खटखटाने पर विचार कर सकता है। उनका कहना है कि कानून की समान व्याख्या और समान क्रियान्वयन लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है।

फिलहाल, इस मुद्दे पर आसनसोल नगर निगम की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन फोसबेकी की इस पहल के बाद यह विषय प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बनता जा रहा है। अब देखना होगा कि नगर निगम इस सवाल का क्या जवाब देता है और क्या राज्य भर में म्यूटेशन शुल्क को लेकर एक समान नीति लागू की जाती है या नहीं।

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