दुर्गापुर : बुधवार को दुर्गापुर में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने बर्धमान–दुर्गापुर लोकसभा सीट पर मिली हार को लेकर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि इस सीट पर भाजपा की पराजय का सबसे बड़ा कारण संगठन की कमजोरी रही। उनके इस बयान को पार्टी के भीतर ईमानदार आत्मविश्लेषण और भविष्य की तैयारी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

बुधवार सुबह दुर्गापुर के सिटी सेंटर से गांधी मोड़ तक मॉर्निंग वॉक करने के बाद दिलीप घोष ने स्थानीय नागरिकों और पार्टी समर्थकों के साथ एक अनौपचारिक चाय-चर्चा में हिस्सा लिया। इसी दौरान उन्होंने चुनावी परिणामों, संगठन की स्थिति और पार्टी की रणनीतिक कमियों पर विस्तार से अपनी राय रखी। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि किसी भी चुनाव में संगठन की भूमिका सबसे अहम होती है और जब संगठन कमजोर होता है, तो उसका सीधा असर परिणामों पर पड़ता है।
दिलीप घोष ने अपने राजनीतिक अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि मेदिनीपुर में उन्होंने लगातार पांच वर्षों तक आम जनता के बीच रहकर काम किया। गांव-गांव, बूथ-बूथ जाकर संगठन को मजबूत करने का अवसर उन्हें मिला, जिसका लाभ पार्टी को वहां मिला। इसके विपरीत, बर्धमान–दुर्गापुर लोकसभा क्षेत्र में उन्हें बहुत सीमित समय के भीतर उम्मीदवार घोषित किया गया। ऐसे में न तो संगठन की कमजोर कड़ियों को जोड़ने का समय मिला और न ही जमीनी स्तर पर व्यापक तैयारी हो सकी।
उन्होंने साफ कहा कि कुछ महीनों में मजबूत संगठन खड़ा करना आसान नहीं होता। चुनाव के समय जब संगठन पूरी तरह सक्रिय और एकजुट न हो, तो प्रत्याशी को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। बर्धमान–दुर्गापुर में भी यही स्थिति देखने को मिली, जहां संगठनात्मक ढांचे की कमी पार्टी पर भारी पड़ गई।

दिलीप घोष का यह बयान केवल हार की व्याख्या भर नहीं था, बल्कि उसमें भविष्य के लिए एक संदेश भी छिपा था। उन्होंने संकेत दिया कि यदि पार्टी को आने वाले चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करना है, तो जमीनी स्तर पर संगठन को फिर से मजबूत करना होगा। कार्यकर्ताओं की सक्रियता, बूथ स्तर की तैयारी और स्थानीय मुद्दों से जुड़ाव को प्राथमिकता देनी होगी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दिलीप घोष की यह टिप्पणी भाजपा के भीतर चल रहे आत्ममंथन को उजागर करती है। खासकर 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह के बयान यह दर्शाते हैं कि पार्टी नेतृत्व अब केवल आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से हटकर अपनी आंतरिक कमजोरियों पर ध्यान देने के मूड में है।
चाय-चर्चा के दौरान स्थानीय लोगों ने भी अपने सुझाव और अनुभव साझा किए। कई समर्थकों ने संगठन में समन्वय की कमी और जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा जैसे मुद्दों को उठाया। दिलीप घोष ने इन बातों को गंभीरता से सुनते हुए भरोसा दिलाया कि पार्टी भविष्य में इन पहलुओं पर काम करेगी।
कुल मिलाकर, बुधवार को दुर्गापुर में दिलीप घोष का बयान भाजपा के लिए एक चेतावनी और अवसर दोनों के रूप में सामने आया है—चेतावनी इसलिए कि संगठन की अनदेखी भारी पड़ सकती है, और अवसर इसलिए कि समय रहते सुधार कर भविष्य की राह मजबूत की जा सकती है।














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