आसनसोल : औद्योगिक पहचान के लिए प्रसिद्ध आसनसोल ने शुक्रवार को अपनी सांस्कृतिक आत्मा का ऐसा परिचय दिया, जिसने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। दक्षिण बंग लोक संस्कृति अकादमी की पहल पर आयोजित दो दिवसीय बंगला संस्कृति उत्सव का समापन उत्साह, तालियों और लोकधुनों के बीच हुआ। रवींद्र भवन का प्रांगण सुबह से ही कलाकारों, साहित्य प्रेमियों और संस्कृति के अनुरागियों से भरा नजर आया।

महोत्सव में राज्य के अलग–अलग हिस्सों से आए कलाकारों ने अपनी परंपरागत विधाओं का प्रदर्शन कर यह संदेश दिया कि लोक संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि आज भी समाज की धड़कन है। रंग-बिरंगी वेशभूषा, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की स्वर लहरियां और मंच पर प्रस्तुत लोक शैलियों ने वातावरण को पूरी तरह से सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक मंगलाचरण से हुई, जिसके बाद बाउल गायकों ने अपनी सूफियाना अंदाज में भक्ति और जीवन दर्शन को सुरों में पिरोया। लोकनृत्य दलों ने ग्रामीण जीवन की झलक पेश की तो कविगान की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को शब्दों के अनोखे संग्राम से परिचित कराया। जात्रा शैली की नाटकीय अभिव्यक्तियों ने भी खूब वाहवाही बटोरी। हर प्रस्तुति के बाद सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता था।
इस आयोजन की खास बात यह रही कि इसमें नई पीढ़ी और अनुभवी कलाकारों का सुंदर संगम देखने को मिला। बच्चों ने जहां उत्साह और ऊर्जा से भरपूर प्रस्तुतियां दीं, वहीं वरिष्ठ कलाकारों ने अपने अनुभव से कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की। दर्शकों ने भी पूरे समय अनुशासन और रुचि के साथ कार्यक्रम का आनंद लिया।
अकादमी के पदाधिकारियों ने बताया कि ऐसे उत्सवों का उद्देश्य लोक परंपराओं को पुनर्जीवित करना और कलाकारों को पहचान दिलाना है। उनका मानना है कि जब विभिन्न जिलों की कलाएं एक मंच पर आती हैं तो सांस्कृतिक संवाद मजबूत होता है। इससे कलाकारों को सीखने और आगे बढ़ने का अवसर भी मिलता है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों को सहेजना बेहद आवश्यक है, और यह आयोजन उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

स्थानीय सांस्कृतिक संगठनों ने भी इस महोत्सव में सक्रिय भूमिका निभाई। स्वयंसेवकों ने व्यवस्थाओं को संभाला, जबकि कई समूहों ने कलाकारों के स्वागत और ठहरने में सहयोग किया। इस सामूहिक प्रयास ने आयोजन को और भव्य बना दिया।
संस्कृति प्रेमियों का कहना था कि इस तरह के कार्यक्रम शहर की पहचान को नई ऊंचाई देते हैं। आमतौर पर उद्योग और व्यापार के लिए चर्चित रहने वाला आसनसोल जब लोक कला की मेजबानी करता है, तो यह साबित होता है कि यहां सांस्कृतिक चेतना भी उतनी ही प्रबल है।
विशेषज्ञों ने भी माना कि बदलते समय में लोक विधाओं को जीवित रखने के लिए मंच उपलब्ध कराना जरूरी है। इससे न केवल परंपराएं सुरक्षित रहती हैं, बल्कि युवाओं में अपनी विरासत के प्रति गर्व की भावना भी विकसित होती है।
दो दिनों तक चले इस उत्सव ने यह स्पष्ट कर दिया कि सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने की चाह अभी भी लोगों के दिलों में जीवित है। कलाकारों की प्रतिभा और दर्शकों के प्रेम ने मिलकर रवींद्र भवन को लोक रंगों से भर दिया, जिसकी याद लंबे समय तक शहरवासियों के मन में बनी रहेगी।















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