अवसादग्रस्त एसआई ने माता-पिता की हत्या कर खुद को मारी गोली

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आसनसोल :  शुक्रवार को आसनसोल मूल निवासी एवं झाड़ग्राम में पदस्थ पुलिस उपनिरीक्षक (एसआई) जॉयदीप चटर्जी ने एक हृदयविदारक कदम उठाकर पूरे क्षेत्र को स्तब्ध कर दिया। उसने अपनी बीमार माता और वृद्ध पिता की गोली मारकर हत्या कर दी और तत्पश्चात स्वयं को भी गोली मार आत्महत्या का प्रयास किया। घटनास्थल से पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला है, जिसमें पारिवारिक जिम्मेदारियों और मानसिक दबाव का उल्लेख किया गया है। वर्तमान में जॉयदीप की स्थिति अति गंभीर बताई जा रही है और उसका इलाज कोलकाता स्थित एसएसकेएम अस्पताल में चल रहा है।

मूलतः आसनसोल के बामुनपाड़ा निवासी जॉयदीप झाड़ग्राम पुलिस के जंगलमहल बटालियन में एसआई के पद पर कार्यरत था। वह झाड़ग्राम के रघुनाथपुर स्थित गौड़ीय मठ के पास एक किराए के मकान में अपने माता-पिता के साथ रहता था। शुक्रवार सुबह जॉयदीप ने अपनी सर्विस पिस्टल से माता-पिता पर दो राउंड फायरिंग की। पिता देवव्रत चटर्जी और माँ शंपा चटर्जी की मौके पर ही मृत्यु हो गई। इसके बाद उसने ठोड़ी के नीचे गोली मारकर आत्महत्या का प्रयास किया।

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क्या लिखा था सुसाइड नोट में
पुलिस सूत्रों के अनुसार, सुसाइड नोट में लिखा है “पिता की बीमारी और माँ की अस्वस्थता ने मेरी मानसिक स्थिति को तोड़ दिया है। अब इस पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा हूँ। मेरे मरने के बाद उनकी देखभाल कौन करेगा? इसलिए हम तीनों का एक साथ मरना ही बेहतर है। मौत के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है।”

छुट्टी के दौरान ही दिया घटना को अंजाम
जॉयदीप ने 2, 3 और 4 सितंबर को छुट्टी ली थी। इन्हीं छुट्टियों के दौरान उसने यह कदम उठाया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सुबह अचानक गोलियों की आवाज़ सुनाई दी। घर का मालिक और पड़ोसी दौड़कर पहुंचे तो उन्होंने खून से लथपथ शव देखे। तत्काल पुलिस को सूचना दी गई। शवों को पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया गया, जबकि गंभीर अवस्था में जॉयदीप को पहले झाड़ग्राम मेडिकल कॉलेज और बाद में एसएसकेएम अस्पताल रेफर किया गया।

स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि जॉयदीप के माता-पिता बहुत कम घर से बाहर निकलते थे। पिता बुजुर्ग और मूक-बधिर थे, वहीं माँ लंबे समय से बीमार चल रही थीं। जॉयदीप पर अकेले ही दोनों की देखभाल की जिम्मेदारी थी। पड़ोसियों का दावा है कि जॉयदीप अवसादग्रस्त रहता था और बहुत कम किसी से मेलजोल करता था। अधिकतर समय उनके घर का दरवाज़ा बंद ही रहता था।

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सहकर्मियों की अलग राय
हालाँकि, उसके एक सहकर्मी ने मानसिक विक्षिप्तता के दावों को नकारते हुए कहा कि जॉयदीप अपने कर्तव्यनिष्ठ स्वभाव के लिए जाना जाता था। उसने अपने माता-पिता को गाँव से लाकर साथ रखने का निर्णय इसलिए लिया था ताकि उनकी सेवा कर सके। उसके पिता पूर्व रेलवे कर्मचारी थे, किन्तु बीमारी के चलते बोलने और सुनने की क्षमता खो बैठे थे। माँ की तबीयत भी निरंतर खराब रहती थी, जिससे जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ गया था।

यह दर्दनाक घटना समाज के सामने एक बार फिर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न खड़ा करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अवसाद और तनाव झेल रहे लोगों को समय रहते परामर्श, संवाद और भावनात्मक सहयोग मिलना आवश्यक है। परिवार और समाज का सहयोग ही ऐसे त्रासद कदमों को रोक सकता है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है।

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