
आसनसोल : पश्चिम बर्धमान जिला युवा कांग्रेस ने शनिवार को एक अहम मुद्दे को लेकर जिला शासक कार्यालय का रुख किया। युवा कांग्रेस अध्यक्ष रवि यादव के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। इसमें प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च विद्यालय तक सभी सरकारी और निजी स्कूलों में बांग्ला भाषा को अनिवार्य रूप से पढ़ाने की मांग की गई।
युवा कांग्रेस अध्यक्ष रवि यादव ने कहा कि पश्चिम बंगाल में लंबे समय से हिंदी और उर्दू भाषी लोगों के सामने सांस्कृतिक जुड़ाव की समस्या रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि हाल के दिनों में कुछ संगठनों द्वारा हिंदी व उर्दू भाषियों पर सामाजिक हमले भी किए गए हैं। उनकी दलील थी कि इन समुदायों के बच्चों को शिक्षा व्यवस्था में बांग्ला भाषा पढ़ने का अवसर नहीं मिलता। यही कारण है कि वे बंगाल की संस्कृति और परंपराओं से पूरी तरह जुड़ नहीं पाते।

रवि यादव ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को इस असुविधा का सामना न करना पड़े, इसके लिए बांग्ला शिक्षा को प्राथमिक स्तर से ही अनिवार्य करना आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मांग किसी भाषा या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि एकता और सांस्कृतिक सामंजस्य को मजबूत करने के लिए है।
प्रदेश कांग्रेस सचिव प्रसनजीत पुईतुंडी ने भी इस ज्ञापन का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि आज की स्थिति में जब सरकारी सहयोग से भी हिंदी और उर्दू भाषियों को निशाना बनाया जा रहा है, तब यह अत्यंत चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि यदि ये समुदाय स्वयं बांग्ला भाषा सीखने और अपनाने की इच्छा जता रहे हैं तो सरकार को इसके लिए ठोस व्यवस्था करनी चाहिए।
पुईतुंडी ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में किसी एक भाषा को थोपना नहीं चाहिए, बल्कि सभी को अवसर मिलना चाहिए कि वे स्थानीय भाषा सीख सकें और समाज से बेहतर तरीके से जुड़ सकें। उन्होंने कहा कि बांग्ला शिक्षा अनिवार्य करने का कदम राज्य की बहुभाषी संस्कृति को और भी समृद्ध करेगा।

कांग्रेस पार्षद एस.एम. मुस्तफा ने भी इस मांग का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बांग्ला पढ़ाई अनिवार्य करने से समाज में आपसी भाईचारा और एकता मजबूत होगी। इस मौके पर ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष शाह आलम खान, कांग्रेस नेता काजल दत्ता, युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता राहुल रंजन, विनय बर्मन, जीशान अंसारी, ताहिर खान, अधिवक्ता राजेश्वर शर्मा सहित अनेक पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद रहे।
इस मांग को लेकर शिक्षा और सामाजिक हलकों में चर्चा छिड़ गई है। जानकारों का कहना है कि यदि बच्चों को प्रारंभिक स्तर से ही स्थानीय भाषा पढ़ाई जाएगी तो उन्हें आगे चलकर सामाजिक व सांस्कृतिक समझ में आसानी होगी। साथ ही रोजगार और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी उन्हें किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी।














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