
आसनसोल /दुर्गापुर : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को दुर्गापुर के नेहरू स्टेडियम में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था। इस दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल में 5400 करोड़ रुपए की विभिन्न परियोजनाओं का शिलान्यास एवं उद्घाटन किया। अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कथित भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज, महिलाओं पर हो रहे अत्याचार और राज्य में घुसपैठियों के संरक्षण जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया। उन्होंने यह भी दावा किया कि 2026 में भाजपा सत्ता में आएगी और बंगाल को ‘सोनार बांग्ला’ बनाया जाएगा।
हालांकि इस पूरे भाषण में आश्चर्यजनक रूप से एक शब्द भी कोयला और बालू की अवैध तस्करी पर नहीं कहा गया, जबकि यह इलाका—शिल्पांचल और कोयलांचल—इन्हीं अवैध गतिविधियों के लिए कुख्यात है। रानीगंज, पांडेश्वर, कुल्टी, बर्नपुर, जामुड़िया जैसे क्षेत्रों में वर्षों से अवैध खनन का कारोबार धड़ल्ले से चलता आ रहा है, जिसमें मजदूरों की जान तक जा रही है। फिर भी प्रधानमंत्री की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
28 जून को जामुड़िया थाना अंतर्गत नॉर्थ सियारसोल इलाके में एक अवैध कोयला खदान में दो युवकों की जहरीली गैस से मौत हो गई थी। ऐसी घटनाएं अब आम हो चली हैं, परंतु न राज्य सरकार की नींद खुली है और न ही केंद्र सरकार इस पर सख्ती से बोलती दिखी। राज्य में तृणमूल सरकार के कार्यकाल में अवैध खनन ने संगठित माफिया रूप ले लिया है। आरोप है कि इस कारोबार में स्थानीय नेताओं, पुलिसकर्मियों और खनन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि भाजपा के स्थानीय विधायक, सांसद और संगठन के नेता क्या इन जानकारियों से प्रधानमंत्री को अवगत नहीं कराते?

क्या केंद्र और राज्य दोनों की सहमति से चल रही है कोयला-बालू की यह अवैध अर्थव्यवस्था?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस प्रकार से राज्य सरकार को घेरते हैं, उससे जनता को यह अपेक्षा थी कि वह इस बार कोयला-बालू माफिया पर भी कठोर संदेश देंगे, विशेषकर तब जब पिछले कुछ वर्षों में इस कारोबार में अनेक निर्दोष मजदूरों की मौत हो चुकी है। कई स्थानीय अखबारों ने इस विषय पर लगातार खबरें प्रकाशित की हैं, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई ना के बराबर रही है।
अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या भाजपा के विधायक—जैसे डॉ. अजय पोद्दार, लखन घुरुई, अग्निमित्रा पाल और जिलाध्यक्ष देवतनु भट्टाचार्य—ने यह मुद्दा प्रधानमंत्री तक पहुँचाने में लापरवाही बरती या फिर यह एक सोची-समझी राजनीतिक चुप्पी है?
जनता पूछ रही है कि जब भाजपा के नेता हर छोटे-बड़े मुद्दे को प्रधानमंत्री के सामने रखते हैं, तो फिर शिल्पांचल में हो रही कोयला-बालू की लूट पर उनकी ज़ुबान क्यों बंद है? क्या वाकई प्रधानमंत्री तक यह बात नहीं पहुंचाई गई, या फिर राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए इस विषय को जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है?

दूसरी ओर तृणमूल सरकार पर सवाल उठता है कि इतने वर्षों से यदि अवैध खनन बेरोकटोक चलता रहा है, तो यह प्रशासनिक संरक्षण के बिना कैसे संभव है? ममता सरकार का मौन, स्थानीय पुलिस की निष्क्रियता और माफियाओं की बेखौफ हरकतें इस बात का प्रमाण हैं कि इस लूट में कहीं न कहीं सत्ता की भागीदारी है।
जनता अब दोनों ही दलों—भाजपा और तृणमूल—से यह पूछ रही है कि अवैध खनन में मारे गए गरीबों की मौत का जिम्मेदार कौन है? क्या चुनावी भाषणों में सिर्फ भावनात्मक मुद्दे उठाकर सच्चाई से ध्यान भटकाना ही राजनीतिक रणनीति बन गई है?
कोयला और बालू की लूट पर यदि न केंद्र सरकार बोल रही है, न राज्य सरकार, तो आम जनता किससे न्याय की उम्मीद करे?
यह मौन दोनों ही सरकारों की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।
क्या अब भी इस लूट पर कार्रवाई होगी, या चुनाव तक सब कुछ यूँ ही चलता रहेगा?














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