
आसनसोल : डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए आसनसोल नगर निगम ने वैज्ञानिक और प्राकृतिक समाधान अपनाते हुए गप्पी मछलियों की मदद से डेंगू के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। गुरुवार को नगर निगम के चार नंबर बोरो कार्यालय क्षेत्र में एक विशेष अभियान के तहत लगभग 20,000 गप्पी मछलियों का वितरण किया गया, जिन्हें स्थानीय लोगों से नालों, डबरों, जलाशयों और रुके हुए पानी में छोड़ने की अपील की गई।गप्पी मछलियों की विशेषता यह है कि वे मच्छरों के अंडों और लार्वा को खाकर उनका विकास रोकती हैं, जिससे डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों की रोकथाम संभव हो पाती है। इस पहल को लेकर स्थानीय जनता में जबरदस्त उत्साह और जागरूकता देखने को मिली।

कई लोगों ने इसे “प्राकृतिक टीका” की संज्ञा दी और कहा कि यह पहल रासायनिक दवाओं की जगह सुरक्षित और प्रभावी विकल्प है।नगर निगम के चेयरमैन अमरनाथ चटर्जी ने अभियान की जानकारी देते हुए बताया कि यह केवल चार नंबर बोरो तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अन्य सभी वार्डों और बोरो क्षेत्रों में इसका विस्तार किया जाएगा। उन्होंने कहा —“हम डेंगू के खिलाफ युद्ध स्तर पर काम कर रहे हैं। गप्पी मछलियां हमारी जैविक सेना हैं जो बिना किसी रासायनिक दवा के मच्छरों का सफाया कर सकती हैं।”
इस अभियान के तहत निगम के कर्मियों ने डोर-टू-डोर जाकर लोगों को जागरूक किया, गप्पी मछलियों के महत्व को समझाया, और बताया कि इन मछलियों को कैसे सुरक्षित रूप से जलस्रोतों में छोड़ा जाए। इसके साथ ही लोगों को बताया गया कि वे अपने आस-पास पानी जमा न होने दें, और घरों के आसपास साफ-सफाई बनाए रखें।निगम की ओर से एक “वॉर रूम” भी सक्रिय कर दिया गया है, जो डेंगू की स्थिति पर लगातार निगरानी रखेगा, संदिग्ध मामलों की जानकारी इकट्ठा करेगा और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करेगा। यह वॉर रूम कॉल सेंटर, फील्ड टीम और चिकित्सा व्यवस्था से समन्वय बनाकर काम करेगा। स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने नगर निगम की इस पहल की सराहना की है। वार्ड निवासी संदीप दत्ता ने कहा, “पहली बार ऐसा लगा कि कोई रचनात्मक और दीर्घकालिक समाधान अपनाया गया है।

हर साल फॉगिंग और कीटनाशक छिड़काव के बावजूद डेंगू का खतरा बना रहता था, पर यह तरीका असरदार लगता है।”सामुदायिक स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर नगर निगम की यह पहल न केवल एक तकनीकी समाधान, बल्कि एक जन-जागरूकता अभियान बनता जा रहा है, जिसमें हर वर्ग और हर आयु के लोग स्वेच्छा से हिस्सा ले रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह की प्राकृतिक और सहभागी रणनीति अपनाई जाती रही, तो डेंगू जैसे रोगों पर स्थायी नियंत्रण संभव हो सकेगा।














Users Today : 7
Users Yesterday : 16