पांडवेश्वर : पौधारोपण कार्यक्रम के दौरान पांडवेश्वर के विधायक नरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती और वन विभाग के डीएफओ अनूपम खान के बीच विवाद ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। कार्यक्रम का एक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हो गया है, जिसमें विधायक डीएफओ को सबके सामने फटकार लगाते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि वीडियो की सत्यता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन इस पर सियासी घमासान शुरू हो गया है।
मामला शुक्रवार को लावदोहा ब्लॉक अंतर्गत बांशगड़ा मौजा का है, जहां जिला मिनरल फाउंडेशन की आर्थिक सहायता से वन विभाग की ओर से पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस मौके पर मंत्री प्रदीप मजूमदार, एडीडीए चेयरमैन कवि दत्ता, जिलाशासक पन्नमबलम एस, एसडीएम डॉ. सौरव चटर्जी समेत कई अधिकारी उपस्थित थे। इसी दौरान विधायक और डीएफओ के बीच कहा-सुनी हो गई।
वायरल वीडियो में विधायक नरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि उनके खिलाफ साजिश की जा रही है और उन्हें हराने की कोशिश हो रही है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा नेता एवं पूर्व विधायक जितेंद्र तिवारी ने कहा कि इसका सीधा अर्थ है कि विधायक हार से भयभीत हैं और उसी गुस्से में अधिकारी को सार्वजनिक रूप से डांट रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह जनता के साथ छल है और प्रशासनिक गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली घटना है।
वहीं, विधायक नरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती ने अपने पक्ष में कहा कि बिना वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था किए किसी परियोजना को लागू करना जनविरोधी कदम है। उन्होंने सवाल उठाया कि पांडवेश्वर इलाके के लगभग 12 हजार लोग पत्थर तोड़कर अपनी जीविका चलाते हैं, जिनमें अधिकतर आदिवासी हैं। अगर उस क्षेत्र में पौधारोपण कर दिया जाएगा, तो इन गरीबों की रोजी-रोटी का क्या होगा? विधायक का तर्क था कि उनके विधानसभा क्षेत्र में यह कार्यक्रम आयोजित हो रहा था, फिर भी उनसे किसी तरह की चर्चा नहीं की गई, जो कि अनुचित है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पर्यावरण संरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन स्थानीय लोगों की आजीविका की सुरक्षा सर्वोपरि है। यदि प्रशासन ने पहले उनसे चर्चा की होती और प्रभावित लोगों के लिए रोजगार का विकल्प तलाशा होता, तो किसी भी विवाद की नौबत ही नहीं आती।
इस पूरे विवाद ने इलाके की राजनीति को गर्मा दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो ने आम लोगों में भी चर्चा छेड़ दी है। कुछ लोग इसे विधायक की चिंता बताते हैं तो कुछ इसे सियासी स्टंट मान रहे हैं। फिलहाल प्रशासन ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है।
यह घटना एक बार फिर इस सवाल को खड़ा करती है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण की योजनाओं को लागू करते समय स्थानीय लोगों की आजीविका और अधिकारों को दरकिनार करना कितना सही है।


















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