
आसनसोल : बाजारों में गणेश चतुर्थी की तैयाwरियों की रौनक देखने को मिली। इस बार श्रद्धालुओं के बीच इको-फ्रेंडली गणेश मूर्तियों की मांग में जबरदस्त इज़ाफा हुआ है। पारंपरिक मिट्टी की मूर्तियाँ और प्राकृतिक रंगों से सजी प्रतिमाएँ श्रद्धालुओं की पहली पसंद बन गई हैं।
श्रद्धालु कर रहे पर्यावरण के प्रति जागरूक चयन
स्थानीय कारीगरों का कहना है कि लोग अब प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंगों से बनी मूर्तियों की बजाय मिट्टी, गोबर, भूसा और पेपर माचे से तैयार प्रतिमाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। इन मूर्तियों में हल्दी, कुमकुम और फूल-पत्तियों से बने प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

क्यों हैं खास ये प्रतिमाएँ
इको-फ्रेंडली गणेश मूर्तियाँ न सिर्फ खूबसूरत होती हैं बल्कि जैव-निम्नीकरणीय भी हैं। विसर्जन के बाद ये प्रतिमाएँ पानी में आसानी से घुल जाती हैं, जिससे जलीय जीव और पर्यावरण सुरक्षित रहते हैं। इसके विपरीत, पीओपी और रसायनों से बनी मूर्तियाँ पानी को प्रदूषित कर देती हैं और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाती हैं।
मूर्तिकारों में उत्साह, बढ़ी बिक्री
आसनसोल के मूर्तिकारों का कहना है कि इस बार उन्हें विशेष रूप से इको-फ्रेंडली प्रतिमाओं के ऑर्डर मिले हैं। दुकानों और अस्थायी बाजारों में मिट्टी के गणेश जी की मांग सबसे अधिक है। श्रद्धालु बड़े उत्साह के साथ छोटे-बड़े आकारों की प्रतिमाएँ खरीद रहे हैं। मूर्तिकारों का मानना है कि यह बदलाव समाज में पर्यावरण जागरूकता का सकारात्मक संदेश दे रहा है।

उत्सव और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ
गणेश चतुर्थी हमेशा से उत्साह और आस्था का पर्व रहा है, लेकिन अब यह प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देने लगा है। श्रद्धालु मानते हैं कि जब भक्ति और पर्यावरण संरक्षण साथ जुड़े तो त्यौहार का महत्व और बढ़ जाता है।
समाज को मिला नया संदेश
धार्मिक आयोजनों में इको-फ्रेंडली मूर्तियों का इस्तेमाल लोगों में यह जागरूकता फैला रहा है कि प्रकृति की रक्षा हर इंसान की जिम्मेदारी है। आसनसोल के कई सामाजिक संगठनों ने भी इस बार पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमाओं को अपनाने की अपील की है।














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