
आसनसोल : शहर के प्रसिद्ध ईस्टर्न रेलवे हायर सेकेंडरी मल्टीपरपज स्कूल में शुक्रवार को उस समय हंगामा मच गया, जब सैकड़ों छात्रों और उनके अभिभावकों ने अचानक स्कूल परिसर में प्रदर्शन शुरू कर दिया। आरोप है कि विद्यालय प्रशासन ने शैक्षणिक सत्र के बीच में ही स्कूल का बोर्ड पश्चिम बंगाल बोर्ड से बदलकर सीबीएसई कर दिया है, जिससे विद्यार्थियों का भविष्य संकट में पड़ गया है।
सुबह से ही स्कूल के मुख्य द्वार पर छात्रों और उनके परिजनों की भीड़ जमा हो गई। उन्होंने हाथों में तख्तियां लेकर नारेबाजी की और स्कूल प्रबंधन से तुरंत स्पष्टीकरण देने की मांग की। प्रदर्शन के चलते कुछ समय के लिए शिक्षण कार्य भी ठप पड़ गया।
“तीन महीने वेस्ट बंगाल बोर्ड, अब सीबीएसई का दबाव”
विरोध में शामिल छात्रों ने बताया कि साल की शुरुआत में उन्हें वेस्ट बंगाल बोर्ड के सिलेबस के अनुसार पढ़ाई कराई गई थी। किताबें, नोट्स और परीक्षा सभी उसी पाठ्यक्रम पर आधारित थीं। लेकिन अचानक अब कहा जा रहा है कि आगे की पढ़ाई सीबीएसई बोर्ड के अनुसार होगी। छात्रों का कहना है कि यह बदलाव न केवल भ्रमित करने वाला है, बल्कि उनके करियर पर सीधा असर डाल सकता है।
कक्षा 11वीं की छात्रा प्रिया कुमारी ने कहा, “हमने एडमिशन वेस्ट बंगाल बोर्ड के तहत लिया था। अब अचानक सीबीएसई लागू कर दिया गया है। यह तो बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। मिड-सेशन में ऐसा निर्णय समझ से परे है।”
एक अन्य छात्र अभिषेक कुमार ने कहा कि अब एडमिशन के लिए उन्हें टेस्ट देने को कहा जा रहा है, जबकि वे पहले से स्कूल के विद्यार्थी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीएसई और आईसीएसई पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थियों से उनकी तुलना की जा रही है, जिससे असमान प्रतिस्पर्धा पैदा हो रही है।

अभिभावकों का आरोप — “आश्वासन तो मिला, समाधान नहीं”
प्रदर्शन में शामिल अभिभावकों ने बताया कि इस मुद्दे को लेकर पहले भी रेलवे के डीआरएम कार्यालय और सीनियर डीसीएम को ज्ञापन दिया गया था, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। महिला अभिभावकों ने बताया कि उन्हें पहले आश्वासन दिया गया था कि छात्रों को किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होगी, मगर अब सीट की कमी और बोर्ड परिवर्तन का हवाला देकर बच्चों को ठुकराया जा रहा है।
संगीता देवी, एक अभिभावक, ने कहा, “हमारे बच्चे हिंदी माध्यम से पढ़ते आए हैं। अचानक बोर्ड बदलने से वे हतप्रभ हैं। न नई किताबें उपलब्ध हैं, न शिक्षकों का मार्गदर्शन। ऐसे में वे कैसे पढ़ाई करें?”
कई अभिभावकों का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आने वाले परिवारों के लिए यह स्थिति बेहद कठिन है। क्योंकि अब वे दूसरे स्कूलों में एडमिशन नहीं करा सकते—एक तो सत्र आधा बीत चुका है, और दूसरा निजी स्कूलों में दान राशि (डोनेशन) देना संभव नहीं।
शिक्षकों की कमी और अव्यवस्था भी बनी वजह
प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि स्कूल में शिक्षकों की भारी कमी है। कई विषयों की कक्षाएं नियमित रूप से नहीं लग पा रहीं। इस पर भी प्रबंधन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा। उनका कहना था कि यदि सीटें सीमित थीं, तो बाहरी छात्रों का नामांकन क्यों लिया गया। प्राथमिकता तो विद्यालय के मौजूदा छात्रों को मिलनी चाहिए थी।

प्रधान शिक्षिका ने दिया आश्वासन
इस पूरे मामले पर स्कूल की प्रधान शिक्षिका तापसी मंडल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वह हाल ही में इस पद पर नियुक्त हुई हैं। उन्हें छात्रों की समस्याओं का पूरा आभास है। उन्होंने बताया कि छात्रों और अभिभावकों का प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा और सभी बिंदुओं को उच्च अधिकारियों के पास भेज दिया गया है।
प्रधान शिक्षिका ने कहा, “हमने अभिभावकों से कहा है कि वे पुनः अपने प्रस्ताव जमा करें। सात दिनों के भीतर नामांकन और बोर्ड संबंधी सभी मुद्दों पर निर्णय लिया जाएगा। रेलवे शिक्षा विभाग इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रहा है।”
अंतिम तिथि नजदीक, छात्रों में बेचैनी बढ़ी
12 नवंबर को नामांकन की अंतिम तिथि तय की गई है, ऐसे में छात्रों में तनाव और बढ़ गया है। कई अभिभावक यह सोचकर परेशान हैं कि यदि समय रहते फैसला नहीं हुआ, तो उनके बच्चों का साल बर्बाद हो सकता है।
प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग
अब प्रदर्शनकारी अभिभावक और स्थानीय सामाजिक संगठन रेल प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा के अधिकार का यह सीधा उल्लंघन है और मध्य सत्र में बोर्ड परिवर्तन छात्रों के मानसिक व शैक्षणिक हितों के विपरीत है।
आसनसोल के इस स्कूल में जारी यह विवाद अब शिक्षा व्यवस्था और प्रबंधन की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर रहा है। फिलहाल सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले सप्ताह में रेलवे प्रशासन छात्रों और अभिभावकों की उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है — या यह विवाद और गहराएगा।














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