हुगली/रिसड़ा : राज्य में साइबर अपराधियों का दबदबा इतना बढ़ चुका है कि आम नागरिक अब असुरक्षित, निराश और विवश महसूस कर रहे हैं। कानून व्यवस्था और डिजिटल सुरक्षा के तमाम दावों को ध्वस्त करते हुए रिसड़ा थाना क्षेत्र में एक महिला के बैंक खाते से साइबर ठगों ने बिना किसी रोक-टोक के ₹91,232 उड़ा लिए, और शिकायत किए कई दिन बीत जाने के बावजूद पुलिस और प्रशासन की कार्यशैली गहरी नींद में डूबी हुई प्रतीत हो रही है। यह घटना न सिर्फ अपराधियों की क्रूरता दिखाती है, बल्कि पुलिस और साइबर तंत्र की असमर्थता को भी उजागर करती है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पीड़िता आशा शर्मा, पत्नी देशबंधु शर्मा, निवासी काली रेजिडेंसी, तीसरी मंज़िल, थाना—रिसड़ा, ज़िला—हुगली, के मोबाइल नंबर 82828-24360 पर दिनांक 23 नवंबर 2025 को सुबह 10:00 बजे नंबर 96930-44934 से फोन आया। कॉल करने वाले ने स्वयं को बैंक अधिकारी बताते हुए बैंक संबंधी समस्या का बहाना बनाया और खाते से जुड़ी संवेदनशील जानकारी लेकर धोखाधड़ी को अंजाम दिया।
कुछ ही मिनटों बाद उनके सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, उत्तरपारा शाखा के खाते (खाता संख्या: 3609975216) से ₹40,000, ₹41,234, ₹4,999 और ₹4,999 की चार ट्रांज़ैक्शन में कुल ₹91,232 की राशि ठगों ने लूटी।

पीड़िता ने तत्काल फाइनेंशियल साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करवाई और Acknowledgement No. (स्वीकृति नंबर) 33211250099218 दिनांक 23.11.2025 प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने स्थानीय थाने में भी लिखित शिकायत दी और G.D. (जनरल डायरी) दर्ज करने तथा आरोपी के खिलाफ FIR दर्ज कर कठोर कार्रवाई की मांग की।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर अपराध के बावजूद अब तक न तो FIR दर्ज हुई, न कोई जांच आगे बढ़ी और न ही पीड़िता को यह बताया गया कि कार्रवाई किस स्तर पर लंबित है। प्रशासन की यह चुप्पी, ढीला दृष्टिकोण और जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति न सिर्फ निराशाजनक है बल्कि कानून के प्रति मज़ाक जैसा लगता है।

पीड़िता ने पुलिस और साइबर सेल की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए कहा— “धोखाधड़ी मिनटों में हो गई, लेकिन कार्रवाई हफ्तों में भी शुरू नहीं। क्या नागरिकों की मेहनत की कमाई ठगों के हवाले छोड़ दी जाएगी?”
स्थानीय निवासियों ने इस घटना को प्रशासनिक विफलता का जीवंत उदाहरण बताते हुए कहा कि बिना कड़ी कार्रवाई के साइबर अपराधी बेखौफ रहेंगे और जनता का भरोसा सिस्टम से पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
अब सवाल यह है कि जब शिकायत, प्रमाण और कॉल नंबर उपलब्ध हैं, तो कार्रवाई में देरी क्यों? आखिर कब तक पीड़ितों को थानों और दफ्तरों के चक्कर काटकर अपमान झेलना पड़ेगा?














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