जामुड़िया : भूमि अधिग्रहण के बाद नौकरी की प्रतीक्षा में वर्षों से भटक रहे ज़मीन मालिकों का धैर्य अब जवाब दे चुका है। शनिवार को सोनपुर बाजारी परियोजना के मुख्य कार्यालय के बाहर लगभग बीस प्रभावित परिवारों ने अचानक धरना शुरू कर दिया। सुबह से ही चल रहे इस शांतिपूर्ण लेकिन प्रभावशाली आंदोलन ने कार्यालय परिसर की गतिविधियों को कुछ समय के लिए ठप कर दिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कई दौर की बैठकों, आश्वासनों और दस्तावेज़ी औपचारिकताओं के बावजूद आज तक उन्हें उनका कानूनी हक—रोज़गार—प्राप्त नहीं हुआ है।

धरने में शामिल लोगों के अनुसार, 2016-17 के बीच ईसीएल ने विभिन्न गांवों की कई कृषि ज़मीनें अधिग्रहित की थीं। इन भूखंडों पर कोयला उत्पादन भी पूरा हो चुका है, लेकिन एक भी परिवार को कंपनी द्वारा वादा की गई नौकरी उपलब्ध नहीं कराई गई। स्थानीय निवासी असित राना, जो इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, का कहना है कि पिछले कई वर्षों से वे अधिकारियों के पास चक्कर काट रहे हैं। हर बार केवल आश्वासन मिलता है—कभी दस्तावेज़ पूरे करने की बात, तो कभी प्रक्रिया जल्द शुरू होने का वादा। राना के शब्दों में, “सालों से प्रतीक्षा करते-करते अब बस हो चुकी है। हम सिर्फ अधिकार मांग रहे हैं, कोई एहसान नहीं।”
धरना स्थल पर मौजूद अन्य प्रभावितों ने भी अपने अनुभव साझा किए। कई परिवारों ने बताया कि अधिग्रहण के समय उन्हें स्पष्ट रूप से नौकरी का आश्वासन दिया गया था। उस समय वे इसे आजीविका का स्थायी विकल्प समझकर अपनी उपजाऊ ज़मीन देने को तैयार हुए थे। लेकिन वर्षों बाद भी जब कंपनी ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो उन्हें लगा कि वे छले जा रहे हैं। कुछ बुजुर्गों ने तो यह भी कहा कि उनके बेटे नौकरी की उम्मीद में उम्र के महत्वपूर्ण वर्ष गंवा चुके हैं।
इधर, ईसीएल प्रबंधन की ओर से भी आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई। सोनपुर बाजारी एरिया के ज़मीन विभाग के अधिकारी अभिषेक दुधवाल ने बताया कि कई परिवारों ने अभी तक आवश्यक दस्तावेज़ जमा नहीं किए हैं। उनके अनुसार, “जैसे ही दस्तावेज़ पूरे होंगे, नियमानुसार नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। कंपनी की नीति स्पष्ट है—भूमि देने वाले हर परिवार को नौकरी अवश्य मिलेगी।” उन्होंने यह भी कहा कि परियोजना के महाप्रबंधक स्वयं व्यक्तिगत रूप से इस मामले पर नज़र रख रहे हैं और प्रयास है कि समस्या जल्द हल हो।
हालांकि प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि दस्तावेज़ों की कमी की बात सिर्फ बहाना है। उनका कहना है कि सभी ज़रूरी प्रमाण-पत्र पहले ही जमा किए जा चुके हैं और यदि कोई कमी थी भी, तो कंपनी ने समय रहते उसे दूर करने का मार्ग नहीं बताया। इनका कहना है कि “जब कंपनी को हमारी ज़मीन चाहिए थी, तब किसी कागज़ में कमी नहीं देखी गई। अब जबकि नौकरी देने की बारी है, नई-नई दिक्कतें बताई जा रही हैं।”

धरने में मौजूद ज़मीन मालिकों ने यह भी चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों की ओर जल्द ध्यान नहीं दिया गया तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। उन्होंने बताया कि आने वाले दिनों में यह आंदोलन स्थानीय संगठनों और जनप्रतिनिधियों के समर्थन से और अधिक मज़बूत किया जाएगा। प्रदर्शनकारियों ने खास तौर पर कहा कि नेतृत्वकर्ता नरेंद्रनाथ चक्रवर्ती और हरेराम सिंह के मार्गदर्शन में वे इस बार पीछे हटने वाले नहीं हैं।
धरने की जानकारी मिलते ही प्रशासनिक हलचल भी तेज हो गई। स्थानीय पुलिस ने स्थल पहुंचकर स्थिति का जायज़ा लिया और प्रदर्शनकारियों से बातचीत की। हालांकि किसी प्रकार का तनावपूर्ण माहौल नहीं दिखा, फिर भी प्रशासन इसे संवेदनशील मामला मानकर सतर्कता बरत रहा है।
धरना स्थल पर जुटे लोगों का कहना है कि यह सिर्फ नौकरी की मांग नहीं है, बल्कि विश्वास और भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न है। ज़मीन देना किसी भी किसान के जीवन का सबसे कठिन निर्णय होता है। बदले में यदि वादा पूरा न हो, तो असंतोष स्वाभाविक है।
ईसीएल प्रबंधन और आंदोलनकारी परिवारों के बीच टकराव की यह स्थिति बीते कई वर्षों से धीरे-धीरे गहराती रही है। अब जब आंदोलन खुले रूप में सामने आ गया है, प्रशासन और कंपनी दोनों पर समाधान खोजने का दबाव बढ़ गया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि जल्द निष्पक्ष निर्णय नहीं हुआ, तो यह विवाद क्षेत्र में बड़े सामाजिक और आर्थिक तनाव का कारण बन सकता है।















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