आसनसोल : लगभग पाँच साल पहले दुर्गापूजा की रात जिस निर्मम हत्या ने पूरे क्षेत्र को दहला दिया था, उस मामले में न्यायालय ने शनिवार को कड़ा फैसला सुनाया। आसनसोल जिला अदालत की एडीजे स्पेशल कोर्ट के न्यायाधीश चिरंजीव भट्टाचार्य ने हत्या के दोषी पाए गए दो सगे भाइयों को आजीवन कारावास के साथ 10-10 लाख रुपये के आर्थिक दंड की सजा सुनाई। अदालत के इस निर्णय के बाद न केवल मृतक परिवार ने राहत की सांस ली, बल्कि स्थानीय लोगों में भी भरोसा पक्का हुआ कि देर-सबेर न्याय अवश्य मिलता है।
दोषी ठहराए गए दोनों भाई— राहुल अकुड़िया तथा याकुब उर्फ सुषील — आसनसोल उत्तर थाना क्षेत्र के कल्ला ईसीएल क्वार्टर के निवासी हैं। इस मामले में लोक अभियोजक चित्तरंजन डे ने सरकार की ओर से मजबूती से पैरवी की, जबकि तत्कालीन जांच अधिकारी एसआई गौतम कर्मकार ने अदालत में सभी तकनीकी व प्रत्यक्ष साक्ष्यों को सुसंगत रूप से प्रस्तुत किया।
मृतक युवक का नाम हर्षवर्धन चौहान उर्फ बिट्टू था, जिसकी उम्र मात्र 23 वर्ष थी। वह कल्ला आईओसी इलाके में रहता था। अदालत में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, अभियुक्तों और मृतक के बीच गहरी मित्रता थी और अक्सर वे साथ घूमते-फिरते थे। लेकिन यही मित्रता एक रात शराब और आवेश के कारण भयावह रूप ले लेगी, यह किसी ने नहीं सोचा था।
यह घटना अक्टूबर 2020 की उस रात की है, जब त्योहार के माहौल में तीनों युवक साथ निकले थे। शुरुआत कल्ला रोड स्थित श्मशान घाट से हुई, जहाँ थोड़ी देर शराब पीने के बाद वे घाघरबुड़ी मंदिर की ओर बढ़े। वहीं से उन्होंने नुनिया नदी किनारे बैठने का फैसला किया। प्रारंभिक बातचीत और मजाक-मस्ती के बीच अचानक विवाद बढ़ गया। आरोपों के अनुसार, हर्षवर्धन ने नशे की हालत में याकुब की पत्नी के बारे में अभद्र टिप्पणी कर दी। गुस्से में तमतमाए याकुब ने पास पड़े पत्थर से उसके सिर पर हमला कर दिया। हर्षवर्धन जब लहूलुहान होकर गिर पड़ा, तब राहुल ने भी वार किया। इसके बाद दोनों ने जूते के फीते से उसका गला दबाकर हत्या सुनिश्चित कर दी।
हत्या के बाद दोनों भाइयों ने अपराध छिपाने की कोशिश में तेजी दिखाई। उन्होंने मृतक का मोबाइल, टैब, बटुआ और एटीएम कार्ड उठा लिया। शव को नुनिया नदी में फेंककर वे काजोड़ा स्थित रिश्तेदारों के घर पहुँचे। वहाँ कपड़े बदलकर मोटरबाइक की नंबर प्लेट निकालकर छिपा दी और फिर बिना नंबर प्लेट की बाइक को बर्नपुर क्षेत्र के रांगापाड़ा इलाके में एक परिचित के घर रख दिया। लेकिन अपराध का जाल ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सका। पुलिस ने क्रमशः मोबाइल, टैब, बटुआ, एटीएम कार्ड और बाइक बरामद कर ली। ये सभी वस्तुएं अभियुक्तों के खिलाफ सबसे पुख्ता सबूत साबित हुईं।
जब हर्षवर्धन उस रात घर वापस नहीं लौटा, तो उसके पिता नरेंद्रनाथ चौहान ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। तीन दिन बाद बदबू फैलने पर घाघरबुड़ी मंदिर समिति ने पुलिस को सूचना दी। नदी से बरामद हुई सड़ी-गली लाश को परिवार ने हर्षवर्धन के रूप में पहचान लिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने हत्या की पुष्टि कर दी और पुलिस सक्रिय हो गई।
जांच के दौरान 25 गवाह सामने आए। इनमें डॉक्टर, पुलिस अधिकारी, स्थानीय नागरिक और तकनीकी जांच से जुड़े विशेषज्ञ शामिल थे। अभियोजन पक्ष ने अदालत में क्रमवार ढंग से घटनाक्रम, वैज्ञानिक जांच और बरामद किए गए सामानों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया। गुरुवार को अदालत ने दोनों भाइयों को दोषी करार दिया और शनिवार को सजा सुना दी।
आज के फैसले के बाद मृतक परिवार ने कहा कि लंबे समय से जिस न्याय की प्रतीक्षा थी, वह अंततः मिल गया। कई स्थानीय निवासियों ने भी अदालत के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, कानून की पकड़ से कोई बच नहीं सकता।
अदालत का यह फैसला न केवल अपराधियों के लिए चेतावनी है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि मित्रता के नाम पर किसी भी प्रकार की हिंसक प्रवृत्ति को न्यायपालिका सख्ती से रोकती है। इस मामले में न्याय मिलने में भले समय लगा हो, लेकिन हर गवाही और साक्ष्य ने यह सुनिश्चित किया कि एक निर्दोष युवक की निर्मम हत्या करने वाले दोषियों को उचित दंड मिल सके।















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