ईसीएल में गहराया आर्थिक संकट, हजारों कर्मियों की चिंता बढ़ी

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आसनसोल : आसनसोल क्षेत्र में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) की वित्तीय स्थिति को लेकर फिर से गंभीर बहस छिड़ गई। कोयला उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि यदि हालात पर तुरंत नियंत्रण नहीं किया गया, तो राज्य के सबसे बड़े कोयला उत्पादक उपक्रमों में से एक गहरी मुश्किलों में फंस सकता है। कंपनी के अधिकारियों के अनुसार, बीते कई महीनों से खरीदारों पर बकाया राशि बढ़ती जा रही है और अब यह आंकड़ा 2,000 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है। इसमें लगभग 500 करोड़ रुपये दामोदर वैली कॉरपोरेशन (डीवीसी) पर बकाया बताये जा रहे हैं।

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रविवार की जानकारी के मुताबिक, इस वित्तीय अव्यवस्था का सबसे सीधा असर ईसीएल के स्थायी श्रमिकों पर पड़ा है। कंपनी की 73 कोलियरियों में कार्यरत लगभग 45,000 कर्मचारियों को अक्टूबर माह का वेतन काफी देरी से मिला, जबकि नवंबर का वेतन अब तक जारी नहीं हुआ है। कर्मचारियों में गहरी नाराजगी है क्योंकि प्रबंधन यह स्पष्ट नहीं कर पा रहा कि देरी कब तक चलेगी। इस पूरे मामले ने श्रमिक परिवारों में असुरक्षा की भावना को और बढ़ा दिया है, खासकर ऐसे समय में जब त्योहारी माह के तुरंत बाद खर्च बढ़ जाते हैं।

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रविवार को जारी बयानों में ईसीएल की ट्रेड यूनियनों ने भी इस आर्थिक स्थिति को “गंभीर संकेत” बताया। उनका कहना है कि उत्पादन सामान्य होने के बावजूद बिक्री का अचानक गिरना चिंताजनक है। कंपनी प्रतिदिन औसतन 1.80 लाख से 2 लाख टन कोयला उत्पादन कर रही है, लेकिन बिक्री घटकर केवल 1.20 लाख टन रह गई है। तकनीकी संचालन से जुड़े निदेशक नीलाद्री राय ने माना कि कोयला बेचने के बावजूद भुगतान न मिलना कंपनी को जकड़ रहा है।

राय ने इस संकट की एक बड़ी वजह असामान्य मौसम को बताया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष लगातार छह महीने तक बारिश हुई, जिसकी वजह से देश के थर्मल पावर प्लांट्स में बिजली उत्पादन की जरूरत कम हुई। गर्मी कम रहने के चलते बिजली की मांग भी पहले की तुलना में काफी कम रही, जिससे प्लांट्स ने पर्याप्त स्टॉक जमा कर लिया और अतिरिक्त कोयला खरीदने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।

रविवार को सामने आई रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पश्चिम बंगाल के कई बिजली संयंत्र अब अपने निजी कोल ब्लॉक से ही कोयला उठा रहे हैं। इसके अलावा, जिन कंपनियों को नये कोल ब्लॉक आवंटित हुए हैं, वे भी अब ईसीएल पर निर्भर नहीं रहीं। इससे कंपनी के विभिन्न डिपो और रेल साइडिंग पर लगभग 6.50 लाख टन कोयला बिना खरीदार के पड़ा हुआ है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक कोयला स्टॉक बढ़ने से गुणवत्ता प्रभावित होती है और आग लगने का खतरा भी बढ़ जाता है।

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रविवार को पूर्व विधायक और वरिष्ठ भाजपा नेता जितेंद्र तिवारी ने इस वित्तीय संकट को “प्रबंधन की विफलता” बताया। उन्होंने दावा किया कि वे पिछले एक वर्ष से ईसीएल की बिगड़ती वित्तीय हालत को लेकर सरकार और प्रबंधन दोनों को चेतावनी देते आ रहे थे। उनके अनुसार, आज झगड़ा प्रोजेक्ट, सोनपुर–बजारी, बांकोला, काजोड़ा समेत कई क्षेत्रों में कर्मचारियों की वही स्थिति है—ड्यूटी पूरी, लेकिन वेतन अधूरा। तिवारी ने कहा कि “अब जब बकाया 2,000 करोड़ तक जा पहुंचा है, तब कंपनी और केंद्र सरकार को समझना चाहिए कि यह सिर्फ वित्तीय मामला नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन का प्रश्न है।”

रविवार को कर्मचारियों के बीच चर्चा यह भी रही कि यदि डीवीसी शीघ्र भुगतान कर दे, तो कंपनी कुछ राहत पा सकती है। हालांकि कर्मचारियों का कहना है कि यह समाधान स्थायी नहीं है। जब तक कोयला बिक्री, भुगतान प्रणाली और खरीदारों पर नियंत्रण की नीति मजबूत नहीं होगी, तब तक ऐसी देरी बार–बार सामने आती रहेगी।

ईसीएल के इस संकट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि देश के बड़े सार्वजनिक उपक्रमों की वित्तीय स्थितियों की समीक्षा कितनी गंभीरता से की जा रही है। रविवार को आए बयानों और आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि तत्काल ठोस कदम न उठाए गए तो कोयला क्षेत्र के सबसे पुराने और बड़े नियोक्ता में से एक की कार्यक्षमता और विश्वसनीयता पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

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