काजोड़ा में ईसीएल आवास तोड़फोड़ रुकी, विरोध ने टीम लौटाई

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अंडाल :  सोमवार को ईसीएल के काजोड़ा क्षेत्र अंतर्गत नबोकाजोड़ा सात नंबर इलाके में उस समय तनावपूर्ण स्थिति बन गई, जब पुराने और परित्यक्त आवासों को हटाने पहुंची कंपनी की टीम को स्थानीय लोगों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ा। सुरक्षा में तैनात सीआईएसएफ के जवानों और नबोजामबाद परियोजना के अधिकारियों को अंततः बिना कार्रवाई किए वापस लौटना पड़ा। घटना के बाद पूरे इलाके में हलचल और असंतोष का माहौल बना हुआ है।

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कंपनी अधिकारियों के अनुसार, यह अभियान ईसीएल के उन आवासों को हटाने के लिए था, जो वर्षों से अनुपयोगी पड़े हैं और जिनका रखरखाव संभव नहीं है। नबोजामबाद परियोजना के उप कार्मिक प्रबंधक (एचआर) आशिष मोहना ने बताया कि योजना के तहत केवल परित्यक्त और जर्जर मकानों को ध्वस्त किया जाना था। हालांकि, जैसे ही टीम मौके पर पहुंची, स्थानीय महिला-पुरुष बड़ी संख्या में एकत्र हो गए और अभियान का विरोध शुरू कर दिया।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे कई दशकों से इन आवासों में रह रहे हैं और उनका जीवन-यापन पूरी तरह इसी क्षेत्र पर निर्भर है। लोगों ने सवाल उठाया कि यदि अचानक घर तोड़ दिए गए, तो वे अपने परिवारों के साथ कहां जाएंगे। विरोध कर रहे निवासियों का यह भी आरोप है कि कंपनी ने किसी तरह की पूर्व सूचना या वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना कार्रवाई शुरू करने की कोशिश की।

इस विरोध को राजनीतिक समर्थन भी मिला। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे पश्चिम बर्दवान जिला परिषद के सहकारी सभाधिपति विष्णुदेव नोनिया और काजोड़ा अंचल तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष मलय चक्रवर्ती ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिना पुनर्वास एक भी परिवार को हटने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि जामबाद ओसीपी परियोजना के दौरान जिस तरह प्रभावितों को पुनर्वास पैकेज दिया गया था, उसी तरह की व्यवस्था यहां भी लागू करनी होगी।

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नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि ईसीएल प्रबंधन ने पुनर्वास की ठोस योजना पेश नहीं की, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। स्थानीय लोगों ने भी एक स्वर में कहा कि वे अपने हक और घरों की रक्षा के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार हैं।

फिलहाल, ईसीएल की टीम के लौटने के बाद स्थिति शांत जरूर है, लेकिन असमंजस बना हुआ है। प्रशासन और कंपनी प्रबंधन के अगले कदम पर सभी की नजरें टिकी हैं। यह मामला अब केवल आवास हटाने का नहीं, बल्कि पुनर्वास और मानवीय सरोकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है।

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