आसनसोल रेल प्रकरण: ईमानदार डीआरएम का तबादला विवादों में

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आसनसोल :  बुधवार को आसनसोल रेल मंडल से जुड़ा एक गंभीर और संवेदनशील मामला सामने आया, जिसने रेलवे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चर्चित नारे— “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा”— के विपरीत हालात का संकेत देता यह मामला आसनसोल की तत्कालीन मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) रहीं विनीता श्रीवास्तव के कथित उत्पीड़न से जुड़ा है। महज छह महीने के कार्यकाल में ही उनका अचानक तबादला कर दिया गया, जिसे लेकर अब न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर बहस तेज हो गई है।

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सूत्रों के अनुसार, जमुई के तेलवा बाजार क्षेत्र में हुए एक बड़े रेल हादसे के बाद डीआरएम विनीता श्रीवास्तव ने मौके पर पहुंचकर तेजी से राहत और बहाली कार्य की निगरानी की थी। हादसे के तुरंत बाद उनके कुशल प्रबंधन, निरंतर उपस्थिति और त्वरित निर्णयों की रेलवे के कई अधिकारियों ने सराहना भी की थी। इसके बावजूद यातायात बहाली में कथित देरी का हवाला देकर उन्हें अचानक पश्चिम मध्य रेलवे स्थानांतरित कर दिया गया। इस फैसले ने पूरे प्रकरण को संदेह के दायरे में ला दिया।

इस स्थानांतरण आदेश को डीआरएम विनीता श्रीवास्तव ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट), कोलकाता में चुनौती दी है। उनका कहना है कि न तो उन्हें स्थानांतरण आदेश की विधिवत प्रति दी गई और न ही किसी प्रशासनिक आवश्यकता की स्पष्ट जानकारी। कैट में सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने रेलवे प्रशासन से सवाल किया कि एक ही दिन में तबादला आदेश जारी कर चार्ज सौंपने का क्या औचित्य था। न्यायाधिकरण ने रेलवे को जवाब दाखिल करने के लिए समय देते हुए 8 जनवरी 2026 तक यथास्थिति बनाए रखने और किसी भी दमनात्मक कार्रवाई से रोकने का आदेश दिया है।

रेलवे की ओर से यह तर्क दिया गया कि दुर्घटना के बाद बहाली कार्य में देरी कैश इम्प्रेस्ट प्रस्ताव को समय पर स्वीकृति न मिलने के कारण हुई। हालांकि रेलवे के ही नियमों— एमएसओपी पार्ट-सी— के अनुसार दुर्घटना के समय बहाली से जुड़े खर्चों की स्वीकृति का अधिकार संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को होता है, डीआरएम की अनुमति अनिवार्य नहीं होती। ऐसे में देरी का सारा दोष डीआरएम पर डालना नियमसम्मत नहीं माना जा रहा।

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इस पूरे विवाद में एक और अहम पहलू सामने आया है। बताया जा रहा है कि अक्टूबर 2025 में डीआरएम विनीता श्रीवास्तव ने आसनसोल मंडल की एक महत्वपूर्ण रेलवे भूमि को आरएलडीए को सौंपे जाने को लेकर पूर्व रेलवे मुख्यालय को पत्र लिखकर जांच की मांग की थी। कुछ अधिकारियों का दावा है कि इस भूमि हस्तांतरण में दबाव और अनियमितता की आशंका थी, जिसे उन्होंने उजागर किया। माना जा रहा है कि यही सख्ती और ईमानदारी उनके तबादले की वजह बनी।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस पूरे घटनाक्रम को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी यह मामला तेजी से चर्चा में है। अब सबकी निगाहें 8 जनवरी 2026 की कैट सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि रेलवे प्रशासन अपने फैसले को किस तरह उचित ठहराता है। फिलहाल रेलवे की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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