पत्रकारों पर हमला, बेलडांगा हिंसा ने अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनी

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कांकसा :  रविवार का दिन जहां आमतौर पर सुकून और आत्मचिंतन का माना जाता है, वहीं पश्चिम बंगाल में यह दिन पत्रकारिता की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल छोड़ गया। झारखंड में एक हॉकर की कथित पिटाई से उपजे विरोध-प्रदर्शन ने जब मुर्शिदाबाद के बेलडांगा इलाके में उग्र रूप लिया, तो उसकी आंच पत्रकारों तक पहुंच गई। खबर जुटाने गई एक महिला पत्रकार पर हमला न केवल व्यक्तिगत हिंसा का मामला है, बल्कि यह संकेत भी है कि राज्य में सच दिखाने की कीमत कितनी भारी पड़ सकती है।

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घटना की शुरुआत झारखंड में एक हॉकर के साथ हुई कथित बर्बरता से हुई। गंभीर रूप से घायल अवस्था में जब वह मुर्शिदाबाद पहुंचा, तो स्थानीय लोगों ने मानवीय संवेदना दिखाते हुए उसे एंबुलेंस में बैठाया और न्याय की मांग को लेकर सड़क पर उतर आए। शुक्रवार को बेलडांगा में रेलवे लाइन के समानांतर सड़क जाम कर दिया गया। देखते ही देखते हालात इतने बिगड़ गए कि रेल और सड़क यातायात पूरी तरह ठप हो गया। उत्तर और दक्षिण बंगाल के बीच संपर्क लगभग टूट गया, जिससे आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया।

इसी उथल-पुथल के बीच कोलकाता के एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनल की महिला पत्रकार सोमा मैती अपने फोटोजर्नलिस्ट साथी के साथ घटनास्थल पर पहुंचीं। आरोप है कि जैसे ही उन्होंने कैमरा उठाया, भीड़ के एक हिस्से ने उन्हें निशाना बना लिया। बाल पकड़कर घसीटना, धक्का-मुक्की और मारपीट—यह सब कुछ चंद मिनटों में हुआ। किसी तरह जान बचाकर वह वहां से निकलने में सफल रहीं, लेकिन गंभीर चोटों के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। फिलहाल उनका इलाज जारी है।

रविवार को जैसे ही यह खबर सामने आई, पत्रकार संगठनों और नागरिक समाज में रोष फैल गया। सवाल उठने लगे कि जब पत्रकार अपना पेशेवर कर्तव्य निभा रहे हों, तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? इसी पृष्ठभूमि में भाजपा की वरिष्ठ नेता और राज्य महासचिव लॉकेट चटर्जी ने कांकसा के बासकोपा स्थित एक होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राज्य सरकार और पुलिस की भूमिका पर तीखा हमला बोला।

लॉकेट चटर्जी ने कहा कि पत्रकारों का काम केवल खबर दिखाना है, न कि किसी आंदोलन का हिस्सा बनना। इसके बावजूद महिला पत्रकार के साथ जिस तरह की दरिंदगी हुई, वह शर्मनाक है। उन्होंने आरोप लगाया कि अगर समय रहते वह वहां से नहीं निकलतीं, तो अनहोनी भी हो सकती थी। उनका दावा था कि मौके पर मौजूद पुलिस मूकदर्शक बनी रही। मदद की गुहार लगाने के बावजूद न तो सुरक्षा मुहैया कराई गई और न ही सुरक्षित निकलने के लिए वाहन दिया गया। यहां तक कि टोटो से जाते समय ड्राइवर को भी धमकाया गया।

उन्होंने यह भी बताया कि शनिवार को बेलडांगा में ही अन्य पत्रकारों—कौशिक घोष, पलाश मंडल और फोटो जर्नलिस्ट केश दत्ता—के साथ भी मारपीट हुई। एक के बाद एक पत्रकारों पर हमले यह साबित करते हैं कि राज्य में मीडिया को डराने का सुनियोजित प्रयास हो रहा है।

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भूमिका पर सवाल उठाते हुए लॉकेट चटर्जी ने कहा कि पत्रकारों को सुरक्षा देने के बजाय उन्हें “दूर से तस्वीरें लेने” की सलाह देना सरकार की असंवेदनशीलता को दर्शाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी घटना एक गहरी साजिश का हिस्सा है, जिससे बंगाल को अस्थिर किया जा रहा है।

उन्होंने पिछले आंदोलनों का जिक्र करते हुए कहा कि कभी सीएए के नाम पर, तो कभी अन्य मुद्दों पर हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान, ट्रेनों पर हमले और लूटपाट की घटनाएं हुईं, लेकिन पुलिस हर बार बेबस नजर आई। उनका आरोप था कि तुष्टीकरण की राजनीति ने कानून व्यवस्था को कमजोर कर दिया है।

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प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में लॉकेट चटर्जी ने मांग की कि महिला पत्रकार समेत सभी पीड़ित पत्रकारों पर हमला करने वालों की पहचान कर तुरंत गिरफ्तारी की जाए और उन्हें कड़ी सजा मिले। उन्होंने कहा कि यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो लोकतंत्र की नींव भी हिल जाएगी।

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