आसनसोल : गुरुवार को पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर उस नेता की चर्चा तेज हो गई, जिसे तृणमूल कांग्रेस के भीतर और बाहर दोनों ही खेमों में “संकटमोचक” के रूप में जाना जाता है। यह नाम है—मलय घटक। पश्चिम बर्धमान से लेकर आसनसोल-दुर्गापुर औद्योगिक क्षेत्र तक, जब भी पार्टी संगठन में असंतोष, मतभेद या चुनौतीपूर्ण हालात सामने आते हैं, समाधान की कमान अक्सर मलय घटक के हाथों में ही सौंपी जाती है। उनकी सादगी, संतुलित व्यवहार और कानूनी समझ ने उन्हें न केवल पार्टी नेतृत्व, बल्कि आम कार्यकर्ताओं के बीच भी भरोसे का चेहरा बना दिया है।

आसनसोल उत्तर विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक तस्वीर पर नजर डालें तो यह साफ दिखता है कि कभी वामदलों का मजबूत गढ़ रहा यह इलाका आज पूरी तरह तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव क्षेत्र में आ चुका है। 1951 से 2006 तक के विधानसभा चुनावी इतिहास में वाम दलों का दबदबा रहा। इस दौरान 14 चुनावों में से नौ बार वाम उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस चार बार सफल रही। लेकिन वर्ष 2011 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आए आसनसोल उत्तर विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए।
इस बदलाव के केंद्र में मलय घटक की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2011 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने माकपा की दिग्गज उम्मीदवार रानू रायचौधरी को करीब 47 हजार मतों के बड़े अंतर से हराकर इतिहास रच दिया। यह जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं थी, बल्कि वाम किले में तृणमूल की निर्णायक दस्तक मानी गई। इसके बाद 2016 में भाजपा उम्मीदवार निर्मल करमाकर और 2021 में कृष्णेंदु मुखर्जी को पराजित कर उन्होंने लगातार तीन जीत दर्ज कीं। इन तीनों चुनावों में जीत का अंतर यह दर्शाता है कि क्षेत्र में उनकी व्यक्तिगत स्वीकार्यता और संगठन पर पकड़ कितनी मजबूत है।
मलय घटक का राजनीतिक सफर संघर्ष और धैर्य का उदाहरण है। वर्ष 2001 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई। 2006 में मिली हार के बाद भी उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई, बल्कि क्षेत्र में सक्रिय रहकर जनता से जुड़ाव बनाए रखा। 2011 के ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन के बाद उनकी शानदार वापसी ने उन्हें तृणमूल के प्रमुख स्तंभों में शामिल कर दिया। तब से अब तक वे लगातार आसनसोल उत्तर से विधायक चुने जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार में मलय घटक की भूमिका केवल एक विधायक तक सीमित नहीं रही। 2011 के बाद से वे लगातार कैबिनेट मंत्री रहे हैं। श्रम विभाग, कृषि विपणन विभाग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के साथ-साथ वर्तमान में कानून एवं न्यायिक विभाग और श्रम विभाग की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर है। पेशे से वकील होने के कारण सरकार के कानूनी मामलों में उनकी सलाह को विशेष महत्व दिया जाता है। पार्टी और सरकार दोनों ही स्तरों पर उन्हें मुख्यमंत्री का भरोसेमंद सहयोगी माना जाता है।

श्रम मंत्री के रूप में मलय घटक ने औद्योगिक श्रमिकों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और चाय बागान श्रमिकों के लिए कई योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया। औद्योगिक बेल्ट में मजदूर वर्ग के बीच उनकी मजबूत पकड़ इसी कारण मानी जाती है। श्रमिक समस्याओं को लेकर उनका व्यावहारिक दृष्टिकोण और संवाद शैली उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान दिलाती है।

शैक्षणिक पृष्ठभूमि की बात करें तो आसनसोल में जन्मे मलय घटक ने विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई के बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। राजनीति में आने से पहले वे आसनसोल कोर्ट के प्रतिष्ठित अधिवक्ता रहे। वकालत के अनुभव ने उन्हें न केवल एक सशक्त वक्ता, बल्कि कुशल रणनीतिकार भी बनाया।
अब जब 2026 के विधानसभा चुनाव की आहट सुनाई देने लगी है, तो आसनसोल उत्तर सीट को लेकर राजनीतिक हलचल तेज होना स्वाभाविक है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार की अपेक्षाकृत कम अंतर से हार ने विपक्ष को नई ऊर्जा जरूर दी है। भाजपा हिंदी भाषी और अनुसूचित जाति-जनजाति मतदाताओं में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि वाम और कांग्रेस संभावित तालमेल से चुनौती पेश कर सकते हैं।
फिर भी मौजूदा परिस्थितियों में संगठन पर मजबूत पकड़, प्रशासनिक अनुभव और जनता के बीच भरोसे के चलते मलय घटक को हराना आसान नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि तृणमूल कांग्रेस आसनसोल उत्तर में अपनी जीत की लय बरकरार रखना चाहती है, तो मलय घटक उसका सबसे मजबूत आधार बने रहेंगे। गुरुवार को राजनीतिक गलियारों में यही चर्चा रही कि संकटों के समाधान की उनकी क्षमता ही उन्हें क्षेत्र की राजनीति में अपराजेय बनाती है।















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