आसनसोल : औद्योगिक नगरी बर्नपुर में शुक्रवार को शिक्षा और इतिहास का अनोखा संगम देखने को मिला। एक ओर बर्नपुर बॉयज़ हाई स्कूल (स्थापना 1925) और बर्नपुर गर्ल्स हाई स्कूल के सौ वर्ष पूरे होने का उल्लास था, तो दूसरी ओर इन्हीं ऐतिहासिक शिक्षण संस्थानों के भविष्य को लेकर गहरी चिंता भी सामने आई। शताब्दी समारोह के बीच पूर्व छात्रों ने “स्कूल बचाओ” का संदेश देकर यह स्पष्ट कर दिया कि यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि चेतावनी भी है।

सौ साल की विरासत का उत्सव : शुक्रवार को स्कूल परिसर में आयोजित शताब्दी समारोह में बड़ी संख्या में पूर्व छात्र-छात्राएं, शिक्षक और स्थानीय गणमान्य लोग शामिल हुए। केक काटकर सौ वर्षों की शैक्षिक यात्रा का उत्सव मनाया गया। मंच से वक्ताओं ने अपने छात्र जीवन की स्मृतियां साझा कीं और बताया कि किस तरह इन स्कूलों ने पीढ़ियों को शिक्षित कर समाज को दिशा दी।पूर्व छात्र एवं जनप्रतिनिधि अशोक रूद्र सहित कई वक्ताओं ने कहा कि बर्नपुर बॉयज़ और गर्ल्स हाई स्कूल केवल शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि क्षेत्र की पहचान रहे हैं। इन स्कूलों से निकले विद्यार्थियों ने देश-प्रदेश में विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी हैं।
उत्सव के बीच चिंता की परछाईं : हालांकि समारोह के उल्लास के बीच यह सवाल बार-बार उठा कि क्या यह शताब्दी उत्सव आखिरी साबित होगा? पूर्व छात्रों ने मंच से और अनौपचारिक चर्चाओं में आशंका जताई कि यदि स्कूलों का निजीकरण या बंदीकरण हुआ, तो सौ साल की विरासत खतरे में पड़ जाएगी।उनका कहना था कि इन संस्थानों की स्थापना का उद्देश्य शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना था, जिसे किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने दिया जा सकता।
नेताजी जयंती पर प्रतीकात्मक विरोध : शुक्रवार को ही 23 जनवरी, देशनायक नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती के अवसर पर पूर्व छात्रों ने अपने आंदोलन को एक प्रतीकात्मक स्वरूप दिया। ‘बर्नपुर बॉयज़ एवं गर्ल्स हाई स्कूल बचाओ मंच’ से जुड़े लोग भारती भवन के समीप स्थित नेताजी की प्रतिमा के सामने एकत्र हुए।
जब इस्को प्रबंधन के अधिकारी नेताजी की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे, तब पूर्व छात्रों ने उन्हें गुलाब का फूल भेंट कर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी और एक ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में तीन प्रमुख मांगें : ज्ञापन में स्पष्ट रूप से मांग की गई कि—पहला, दोनों ऐतिहासिक स्कूलों को बंद न किया जाए।दूसरा, किसी भी प्रकार की निजीकरण प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए।तीसरा, इन शिक्षण संस्थानों की सामाजिक और ऐतिहासिक भूमिका को संरक्षित रखा जाए।पूर्व छात्रों ने कहा कि नेताजी के आदर्शों से प्रेरणा लेकर वे शिक्षा के अधिकार और सामाजिक जिम्मेदारी की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
गरीब और श्रमिक परिवारों की चिंता : पूर्व छात्रों का कहना है कि आज भी इन स्कूलों में बड़ी संख्या में गरीब, श्रमिक और औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं। यदि स्कूल बंद हुए या फीस आधारित निजी मॉडल लागू हुआ, तो इन बच्चों की पढ़ाई बाधित हो जाएगी।उनका तर्क है कि ये स्कूल बर्नपुर की सामाजिक चेतना की रीढ़ हैं और इन्हें कमजोर करना पूरे इलाके के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।
शिक्षा बनाम निजीकरण की बहस : शुक्रवार की इस पूरी घटना ने बर्नपुर में शिक्षा और निजीकरण को लेकर नई बहस छेड़ दी है। स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि क्या औद्योगिक प्रबंधन अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से पीछे हट रहा है।पूर्व छात्रों ने संकेत दिया है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। शताब्दी समारोह के इस दिन यह साफ हो गया कि बर्नपुर में स्कूलों की लड़ाई अब केवल अतीत की स्मृतियों की नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों की शिक्षा की है।















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