मैथन जलाशय की संरचना जांचने पहली बार ड्रोन और अंडरवॉटर रोबोट से 3डी परीक्षण

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मैथन :  झारखंड और पश्चिम बंगाल की सीमा पर स्थित ऐतिहासिक मैथन जलाशय की संरचनात्मक मजबूती और वर्तमान स्थिति का आकलन करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक की मदद से व्यापक जांच अभियान शुरू किया गया है। दामोदर वैली कॉर्पोरेशन (डीवीसी) के इस महत्वपूर्ण जलाशय की सेहत का आकलन करने के लिए विशेषज्ञों की एक विशेष टीम द्वारा 3डी डिजिटल परीक्षण की प्रक्रिया आरंभ की गई है।

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इस परीक्षण का उद्देश्य जलाशय के कंक्रीट ढांचे की वास्तविक स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण करना है, ताकि भविष्य में आवश्यक मरम्मत और संरक्षण से संबंधित निर्णय लिए जा सकें। बताया जा रहा है कि मैथन जलाशय में इस प्रकार की आधुनिक तकनीक से पहली बार व्यापक जांच की जा रही है।

इस कार्य के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से जुड़े विशेषज्ञों तथा तकनीकी संस्थानों के पांच सदस्यीय दल को जिम्मेदारी दी गई है। यह टीम अत्याधुनिक उपकरणों और डिजिटल तकनीकों की मदद से जलाशय के ऊपर और नीचे स्थित विशाल संरचनाओं का विस्तृत अध्ययन कर रही है।

विशेषज्ञों द्वारा हाई-पावर ड्रोन कैमरों और उन्नत डिजिटल उपकरणों की सहायता से जलाशय के विभिन्न हिस्सों की तस्वीरें और डेटा एकत्र किया जा रहा है। इस प्रक्रिया के तहत सतह के साथ-साथ पानी के भीतर मौजूद ढांचों की भी जांच की जा रही है। इसके लिए आधुनिक रोबोटिक उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है।

परीक्षण में एरियल ड्रोन, सरफेस सर्वेयर और अंडरवॉटर आरओवी (रिमोट ऑपरेटेड व्हीकल) जैसी तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है। ये उपकरण जलाशय के भीतर मौजूद संरचनाओं की सटीक स्थिति का आकलन करने में सहायक साबित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के माध्यम से प्राप्त आंकड़े भविष्य की मरम्मत और रखरखाव की योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेंगे।

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ज्ञात हो कि मैथन जलाशय का निर्माण बराकर नदी पर किया गया था और यह क्षेत्र की जल और ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस ऐतिहासिक परियोजना का उद्घाटन 27 सितंबर 1957 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था।

मैथन बांध की ऊंचाई लगभग 50 मीटर और लंबाई करीब 4789 मीटर बताई जाती है। यह जलाशय लगभग 65 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और लंबे समय से क्षेत्र की सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और बिजली उत्पादन की जरूरतों को पूरा कर रहा है।

इतिहास के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया का पहला भूमिगत बिजली उत्पादन केंद्र भी इसी परियोजना के तहत स्थापित किया गया था, जो उस समय इंजीनियरिंग की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता था।

डीवीसी के अधिकारियों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण जल संसाधन और संरचना की सुरक्षा तथा दीर्घकालिक उपयोग सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर वैज्ञानिक जांच आवश्यक होती है। इसी उद्देश्य से यह नई पहल शुरू की गई है।

विशेषज्ञों द्वारा तैयार की जाने वाली रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में जलाशय के संरक्षण और रखरखाव से जुड़े आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। अधिकारियों का मानना है कि इस प्रकार की आधुनिक तकनीक का उपयोग जल संरचनाओं की सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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