आसनसोल : कोविड-19 टीकाकरण के बाद कथित दुष्प्रभावों से जुड़ी मौतों के मामलों को लेकर बुधवार को एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम सामने आया। देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था Supreme Court of India ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि टीकाकरण के बाद सामने आने वाले गंभीर प्रतिकूल प्रभावों से जुड़े मामलों के लिए एक स्पष्ट मुआवजा नीति तैयार की जाए। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की नीति से प्रभावित परिवारों को न्यायिक प्रक्रिया के साथ-साथ एक प्रशासनिक सहारा भी मिल सकेगा।

मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति Vikram Nath और न्यायमूर्ति Sandeep Mehta की खंडपीठ ने इस मामले पर विचार किया। अदालत के समक्ष दायर याचिका में यह मांग की गई थी कि कोविड-19 वैक्सीन के संभावित दुष्प्रभावों के कारण जिन लोगों की मृत्यु हुई है, उनके परिवारों को आर्थिक सहायता अथवा मुआवजा प्रदान करने के लिए सरकार एक व्यवस्थित नीति बनाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मुद्दे पर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां भी कीं। कोर्ट ने कहा कि कोविड-19 टीकाकरण अभियान देश के इतिहास का सबसे बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम रहा है और इस अभियान के दौरान किसी भी प्रकार के प्रतिकूल प्रभावों की निगरानी के लिए पहले से ही एक प्रणाली मौजूद है। ऐसे में अदालत ने टीकाकरण के बाद होने वाले दुष्प्रभावों की जांच के लिए अलग से कोई नया विशेषज्ञ पैनल गठित करने की मांग को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में जो तंत्र कार्यरत है, उसी के माध्यम से प्रतिकूल प्रभावों की पहचान और निगरानी की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। न्यायालय का मानना था कि नई समिति बनाने से अनावश्यक संस्थागत जटिलता उत्पन्न हो सकती है, जबकि मौजूदा व्यवस्था पहले से ही इस प्रकार के मामलों की समीक्षा कर रही है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि यदि टीकाकरण के बाद गंभीर दुष्प्रभाव सामने आते हैं और उससे किसी व्यक्ति की मृत्यु या गंभीर स्वास्थ्य समस्या होती है, तो ऐसे मामलों में प्रभावित परिवारों को सहायता प्रदान करने के लिए सरकार के पास स्पष्ट नीति होनी चाहिए। इसी संदर्भ में अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक उपयुक्त मुआवजा नीति तैयार करे और इस विषय में आवश्यक कदम उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कोविड-19 टीकाकरण से जुड़े प्रतिकूल प्रभावों के आंकड़े समय-समय पर सार्वजनिक किए जाने चाहिए। अदालत का मानना है कि पारदर्शिता से लोगों का विश्वास मजबूत होता है और स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों के प्रति जागरूकता भी बढ़ती है। इसलिए सरकार को चाहिए कि टीकाकरण से जुड़े डेटा और रिपोर्ट को नियमित रूप से सार्वजनिक किया जाए।
हालांकि न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट कर दिया कि मुआवजा नीति तैयार करने का अर्थ यह नहीं होगा कि सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण ने किसी प्रकार की कानूनी गलती या जिम्मेदारी स्वीकार कर ली है। अदालत ने कहा कि यह नीति केवल एक सहायक व्यवस्था होगी, जिससे प्रभावित परिवारों को सहायता मिल सके।

साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति या परिवार को लगता है कि टीकाकरण से जुड़े किसी दुष्प्रभाव के कारण उन्हें नुकसान हुआ है, तो वे कानून के तहत उपलब्ध अन्य न्यायिक उपायों का भी सहारा ले सकते हैं। अदालत का यह आदेश किसी भी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों को सीमित नहीं करता है।
दरअसल यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा है, जिन्हें दो युवतियों के माता-पिता ने दायर किया था। उनका दावा था कि कोविड-19 टीकाकरण के बाद उनकी बेटियों की मौत हुई और इस मामले की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। याचिका में पोस्टमॉर्टम और जांच से संबंधित रिपोर्ट सार्वजनिक करने तथा मृतकों के परिवारों को मुआवजा देने की भी मांग की गई थी।
अब सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह टीकाकरण से जुड़े गंभीर दुष्प्रभावों के मामलों के लिए स्पष्ट मुआवजा नीति तैयार करे और संबंधित आंकड़ों को सार्वजनिक करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए। अदालत के इस निर्देश को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।















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