
आसनसोल : बस्तिन बाजार मोड़ के पास जीटी रोड पर बन रहे बहुमंजिला मार्केट कॉम्प्लेक्स को लेकर एक के बाद एक नए खुलासे सामने आ रहे हैं। ताजा जानकारी के मुताबिक, इस बहुचर्चित कॉम्प्लेक्स के निर्माण स्थल से संबंधित ज़रूरी दस्तावेज निगम कार्यालय में उपलब्ध नहीं हैं। निगम सूत्रों की मानें तो निर्माण संबंधी कुछ महत्वपूर्ण कागजात रहस्यमयी तरीके से गायब हो गए हैं, जिन्हें लेकर अब निगम में हड़कंप मच गया है।
हालांकि, निगम प्रशासन ने इन दस्तावेजों की तलाश तेज़ कर दी है, लेकिन अब तक उनका कोई सुराग नहीं मिला है। इससे इस बहुमंजिला इमारत के निर्माण में एक और बड़ी अड़चन खड़ी हो गई है। पहले ही इस इमारत का निर्माण ज़मीन के स्वामित्व को लेकर विवादों में घिरा हुआ था और अब दस्तावेजों के गायब होने से यह प्रोजेक्ट पूरी तरह ठप पड़ने की कगार पर है।
शुरुआत से ही विवादों में घिरा प्रोजेक्ट
गौरतलब है कि इस कॉम्प्लेक्स के निर्माण की योजना तत्कालीन मेयर जितेंद्र तिवारी के कार्यकाल में बनाई गई थी। उस समय इसे एक आधुनिक पार्किंग प्लाजा के रूप में विकसित करने की घोषणा की गई थी। जितेंद्र तिवारी का दावा था कि इस परियोजना के पूरे होते ही बाजार क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही पार्किंग की समस्या का समाधान हो जाएगा।

हालांकि, उनके पद से हटने के बाद इस परियोजना का स्वरूप भी बदल गया और इसे मार्केट कॉम्प्लेक्स में तब्दील कर दिया गया। वर्ष 2018 में आचार्या कंस्ट्रक्शन कंपनी ने इस बहुमंजिला इमारत के निर्माण की शुरुआत की थी।
न निगम की ज़मीन, न वैध निर्माण की अनुमति
अब छह वर्षों के बाद यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जिस जमीन पर यह विशाल इमारत खड़ी की जा रही है, वह न तो नगर निगम की है और न ही इसके लिए वैध निर्माण की कोई ठोस अनुमति प्राप्त हुई है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, इस जमीन का खतियान नंबर एक है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह निजी स्वामित्व की संपत्ति है।

इतना ही नहीं, इमारत का एक हिस्सा रेलवे की ज़मीन से सटी हुई बताई जा रही है, जिससे रेलवे विभाग की अनुमति के बिना कोई भी निर्माण कार्य करना नियमों के विरुद्ध है।
क्या होना चाहिए था?
शहरी नियोजन से जुड़े जानकारों का कहना है कि निगम को इस ज़मीन का निर्माण कार्य शुरू करने से पहले उसे अपने नाम पर रजिस्ट्री करवानी चाहिए थी। ज़मीन जब निगम की होती, तब इस पर वैध रूप से किसी भी प्रकार का निर्माण संभव होता। अब जब मामला खुलकर सामने आ गया है, तो निर्माण कार्य तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक ज़मीन को विधिवत रूप से जिला प्रशासन निगम को हस्तांतरित नहीं कर देता।

प्रशासन की चुप्पी सवालों के घेरे में
इस पूरे मामले पर जिला प्रशासन और निगम की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। आखिर बिना ज़मीन के स्वामित्व के इतने बड़े निर्माण को कैसे अनुमति दी गई? क्या यह लापरवाही थी या जानबूझकर किया गया प्रशासनिक चूक?
फिलहाल निगम अधिकारियों द्वारा लापता दस्तावेजों की खोजबीन की जा रही है, लेकिन जब तक वे दस्तावेज नहीं मिलते और ज़मीन का स्वामित्व स्पष्ट नहीं होता, तब तक यह प्रोजेक्ट अधर में ही लटका रहेगा। स्थानीय लोगों में भी इस परियोजना को लेकर भ्रम और असमंजस की स्थिति बनी हुई है।














Users Today : 1
Users Yesterday : 46