
आसनसोल : आसनसोल से दुर्गापुर तक फैले अजय और दामोदर नदी के विभिन्न घाटों पर इन दिनों वैध खनन की आड़ में अवैध रूप से बालू की खुलेआम तस्करी जारी है। डिसरगढ़, बराकर, बर्नपुर, चुरुलिया, तिराट, बल्लभपुर, अंडाल, पांडेश्वर और दुर्गापुर सहित कई इलाकों के नदी घाटों पर बड़ी-बड़ी मशीनों से बालू निकाल कर ओवरलोड वाहनों में भरकर ग्रामीण सड़कों के माध्यम से ले जाया जा रहा है। इस अवैध कारोबार में न तो प्रशासन का कोई भय है और न ही किसी प्रकार का विरोध देखने को मिल रहा है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह बालू तस्करी माफियाओं द्वारा सुनियोजित तरीके से संचालित की जा रही है और इसमें प्रशासन तथा कुछ राजनीतिक तत्वों की मिलीभगत से संरक्षण प्राप्त है। ग्रामीण बताते हैं कि जिन घाटों से बालू निकाली जा रही है, वहां किसी प्रकार की अनुमति का बोर्ड नहीं होता, और न ही कोई निगरानी तंत्र नजर आता है।
सड़क किनारे या घाटों के समीप खुलेआम खड़े बालू लदे वाहन यह दर्शाते हैं कि इस अवैध कार्य को अंजाम देने वालों को किसी प्रकार का भय नहीं है। रात-दिन लगातार चल रहे इस कारोबार से सरकार को प्रतिदिन लाखों रुपये के राजस्व की हानि हो रही है, जबकि बालू माफिया मोटी रकम कमा रहे हैं।

भाजपा नेता जितेन्द्र तिवारी ने पूर्व में ही चेतावनी दी थी कि नदी से अनियंत्रित तरीके से बालू का खनन भविष्य में गंभीर संकट खड़ा कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि प्रशासन और सरकार इस दिशा में सख्ती नहीं बरतते हैं, तो नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। परन्तु, उस समय उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया, जिसका परिणाम आज साफ दिख रहा है।
सूत्रों की मानें तो दामोदर नदी के कुल्टी थाना क्षेत्र अंतर्गत डिसरगढ़ घाट, बराकर घाट, बर्नपुर रेलवे ब्रिज के पास, सूर्यनगर, कालाझरिया श्मशान घाट सहित हीरापुर क्षेत्र के अन्य स्थानों पर यह गतिविधि बड़े पैमाने पर जारी है। वहीं अजय नदी के जामुड़िया थाना क्षेत्र के चुरुलिया घाट, पांडेश्वर और अंडाल के कई घाटों पर भी यही स्थिति है।
ग्रामीणों द्वारा कुछ स्थानों पर विरोध किए जाने की खबर भी सामने आई थी, लेकिन विरोध करने वालों को या तो धमका दिया गया या पैसों के बल पर चुप करा दिया गया। नतीजा यह है कि अब कोई भी खुलकर विरोध करने को तैयार नहीं है।

इस तरह से निरंतर बालू का अवैध खनन न सिर्फ पर्यावरण के लिए घातक है, बल्कि अजय और दामोदर जैसी प्रमुख नदियों के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा कर रहा है। यदि इसी तरह इन नदियों की दोहन की प्रक्रिया चलती रही तो वह दिन दूर नहीं, जब ये नदियाँ सिर्फ किताबों और इतिहास के पन्नों में रह जाएंगी।
सरकार और प्रशासन को अब इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए और त्वरित कार्रवाई करते हुए दोषियों को पकड़कर कठोर सजा दिलानी चाहिए, ताकि नदियों के अस्तित्व की रक्षा की जा सके। साथ ही पारदर्शी और सख्त निगरानी तंत्र लागू कर इस अवैध कारोबार को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।














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