
बाराबनी : आसनसोल के बाराबनी थाना अंतर्गत अमडीहा चौराहा सोमवार को राजनीतिक टकराव का अखाड़ा बन गया, जब इटापाड़ा कोयला खदान के मजदूरों के वेतन और युवाओं के रोजगार की मांग को लेकर भाजपा प्रतिनिधिमंडल प्रदर्शन करने पहुंचा। उसी समय तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध जताकर रास्ता रोक दिया, जिससे गौरांडी रोड पर लंबा जाम और भारी तनाव उत्पन्न हो गया।
भाजपा का कहना है कि वे शांतिपूर्ण ढंग से खदान श्रमिकों की मांगों को लेकर प्रशासन को ज्ञापन देने आए थे, लेकिन तृणमूल समर्थकों ने जानबूझकर रास्ता रोका और अभद्रता की। भाजपा पश्चिम बर्दवान जिला अध्यक्ष देवतनु भट्टाचार्य ने पुलिस प्रशासन पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा, “हम मजदूरों की आवाज़ बनने आए थे, लेकिन तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने हमें घेर लिया। पुलिस ने हमें ही वापस जाने को कहा। अगर प्रशासन निष्क्रिय रहेगा तो भाजपा कार्यकर्ता खुद समाधान निकालेंगे।”

भाजपा प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई में मजदूरों की मांगों को लेकर उठी आवाज़ राजनीतिक नारेबाजी में दब गई। प्रदर्शन के दौरान भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच जमकर नारेबाजी और आरोप-प्रत्यारोप हुए। पुलिस को बीच-बचाव करना पड़ा, लेकिन आम लोगों को घंटों तक यातायात अवरोध का सामना करना पड़ा।
वहीं तृणमूल कांग्रेस के बाराबनी ब्लॉक अध्यक्ष असित सिंह ने भाजपा पर पलटवार करते हुए कहा, “हमने किसी को नहीं रोका, स्थानीय लोगों ने खुद विरोध किया। खदान स्थानीय लोगों के सहयोग से चालू हुई है और करीब 600 मजदूर काम कर रहे हैं। भाजपा नेता इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देकर कट मनी की राजनीति कर रहे हैं।”

इस घटना के बाद यह स्पष्ट हो गया कि इटापाड़ा खदान की समस्या से अधिक राजनीतिक दलों के बीच श्रेय लेने की होड़ है। एक ओर भाजपा खुद को मजदूरों का हितैषी साबित करना चाहती है, वहीं तृणमूल खुद को ‘स्थानीय हित रक्षक’ के रूप में प्रस्तुत कर रही है। लेकिन इस रस्साकशी में सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता और मजदूरों को हो रहा है, जिनकी असली समस्याएं हाशिये पर चली गई हैं।
गौरांडी रोड पर हुए अवरोध और सड़कों पर फैले तनाव को नियंत्रित करने में पुलिस को घंटों लग गए। यद्यपि स्थिति को नियंत्रण में ले लिया गया, लेकिन पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। भाजपा का आरोप है कि प्रशासन ने तृणमूल का पक्ष लिया, जबकि तृणमूल इसे शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी बता रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे राजनैतिक झगड़ों से परेशान हो चुके हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों, दवा लेने जा रहे मरीजों और काम पर जा रहे लोगों को भारी असुविधा हुई। आम जनता यह सवाल कर रही है कि उनके जीवन को बाधित करने की जिम्मेदारी कौन लेगा?

यह स्पष्ट है कि इटापाड़ा खदान से जुड़े मजदूरों की मांगें बिल्कुल जायज़ हैं – उचित वेतन, नियमित रोजगार और सामाजिक सुरक्षा। लेकिन जब इन मांगों को राजनीतिक मंच बनाकर रोटियाँ सेंकी जाती हैं, तो असली मुद्दा कहीं खो जाता है।
अमडीहा चौराहे की यह घटना एक चेतावनी है कि यदि प्रशासन समय रहते निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करता, तो राजनीतिक स्वार्थ की आग आम जनता की जिंदगी को जला सकती है। अब सवाल है कि मजदूरों की समस्याओं पर असल में कार्रवाई कब होगी, और क्या राजनीति से ऊपर उठकर कोई उनकी आवाज़ सुनेगा?














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