
सालानपुर : ईसीएल सालानपुर क्षेत्र की बंजिमिहारी और मोहनपुर ओपन कास्ट परियोजनाओं (ओसीपी) में कोयला उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से खदानों के विस्तार की योजना पर काम जारी है, लेकिन शिफ्टिंग और विस्थापन संबंधी समस्याओं के कारण यह परियोजना फिलहाल अधर में लटकी हुई है। बंजिमिहारी ओसीपी में करीब 9 मिलियन टन कोयले का भंडार मौजूद है, जिसे निकालने से क्षेत्र और देश दोनों को बड़ा लाभ मिल सकता है। लेकिन इसके लिए 733 एकड़ जमीन की आवश्यकता है, जिसमें से अब तक 284 एकड़ भूमि को ईसीएल मुख्यालय से स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।

दस गांवों का विस्थापन आवश्यक
ईसीएल सूत्रों के अनुसार, परियोजना विस्तार के लिए 10 गांवों को विस्थापित करना होगा। कुछ गांवों के लोग तैयार हैं, लेकिन कई ग्रामीण अपने पुश्तैनी घर और जमीन छोड़ने को राजी नहीं हैं। यही स्थिति परियोजना की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। ईसीएल के करीब 70 आवासों को खाली कराने में भी प्रबंधन को कठिनाई हो रही है, क्योंकि इनमें से कई पर बाहरी लोगों का अवैध कब्जा है।
कोयला उत्पादन पर असर
मार्च महीने में बंजिमिहारी ओसीपी का पुराना टेंडर समाप्त हो गया, जिसके चलते अप्रैल से कोयला उत्पादन बंद है। इससे कंपनी को कई करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। पहले यह कार्य डेको कंपनी कर रही थी, लेकिन घाटे का हवाला देते हुए अब उसने खनन से इनकार कर दिया है। ईसीएल प्रबंधन नई एजेंसी के लिए टेंडर प्रक्रिया में जुटा हुआ है ताकि कोयला उत्पादन दोबारा शुरू किया जा सके।

निवेश और संभावनाएं
इस परियोजना में ईसीएल द्वारा लगभग 600 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, बंजिमिहारी ओसीपी से मिलने वाले कोयले का उपयोग देश के पावर प्लांटों की जरूरतों को पूरा करने में किया जाएगा। यह परियोजना यदि समय पर शुरू हो जाती है, तो सात वर्षों तक कोयला उत्पादन संभव है, जिससे न केवल ईसीएल को लाभ मिलेगा, बल्कि क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
भूमि अधिग्रहण एवं पर्यावरणीय स्वीकृति की चुनौती
कुछ परियोजनाओं के लिए नई परियोजना रिपोर्ट (पीआर) बन चुकी है, जबकि कई खदानों के लिए इनवायरमेंट और फॉरेस्ट क्लीयरेंस की प्रक्रिया जारी है। भूमि अधिग्रहण के लिए आवश्यक दस्तावेज मुख्यालय को भेजे गए हैं, जिनकी मंजूरी का इंतजार है।

विस्थापन के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि विस्थापन से प्रभावित परिवारों की आजीविका, सामाजिक संरचना और जीवनशैली पर गहरा असर पड़ता है। इसलिए खनन कार्य प्रारंभ करने से पहले स्थानीय लोगों से परामर्श और सहमति लेना आवश्यक है। साथ ही, पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए ताकि प्रभावित लोग सम्मानपूर्वक नया जीवन शुरू कर सकें।
प्रबंधन के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है कि आर्थिक लाभ की संभावना के साथ सामाजिक संतुलन और मानवीय संवेदनाएं भी कायम रखी जाएं। अब सभी की निगाहें ईसीएल और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।














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