
आसनसोल : आसनसोल-दुर्गापुर शिल्पांचल में बालू माफियाओं का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। दामोदर और अजय नदियों के घाटों से हर दिन सैकड़ों ट्रकों में बालू की तस्करी हो रही है, जिससे न केवल नदियों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि सरकार को भी भारी राजस्व हानि हो रही है। कुल्टी थाना क्षेत्र के अंतर्गत बराकर, डिसरगढ़, बर्नपुर, कालाझरिया, तिराट, डामरा, बल्लभपुर और मेजिया जैसे दामोदर नदी के घाटों पर माफिया तत्वों का पूरा कब्जा बना हुआ है।

इसी प्रकार अजय नदी के किनारे जामुड़िया, चुरुलिया, पांडवेश्वर, कांकसा जैसे इलाकों में भी अवैध खनन का बोलबाला है। वैध खनन की आड़ में अवैध गतिविधियां धड़ल्ले से जारी हैं, जिसमें राजनीतिक संरक्षण की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
बीएलएंडएलआरओ विभाग ने की कार्रवाई
हाल ही में रानीगंज बीएलएंडएलआरओ विभाग ने चालान में गड़बड़ी और ओवरलोडिंग की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए आधा दर्जन से अधिक ओवरलोड ट्रकों को जब्त किया और उनके ऊपर 50 हजार से 75 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया गया। इसी तरह हाल के दिनों में छह और वाहनों को पकड़ा गया। इन सभी वाहनों में या तो बालू आवश्यकता से अधिक भरा हुआ था या फिर उनके चालान में गड़बड़ियां थीं।

फिर भी नहीं रुक रही बालू की तस्करी
बीएलएंडएलआरओ विभाग की कार्रवाई के बावजूद बालू माफियाओं की गतिविधियों में कोई खास कमी नहीं आई है। कार्रवाई के नाम पर केवल छोटे वाहन चालकों पर जुर्माना लगाया जा रहा है, जबकि असली मास्टरमाइंड खुलेआम अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन चाहे, तो इन माफियाओं पर लगाम कस सकता है, लेकिन शायद राजनीतिक दबाव या स्वार्थ के चलते सख्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। नदियों में दिन-रात चल रही बड़ी-बड़ी जेसीबी मशीनें और हाईड्रा द्वारा अवैज्ञानिक ढंग से बालू खनन किया जा रहा है, जिससे नदियों की गहराई बढ़ रही है और बाढ़ का खतरा भी दिनोंदिन बढ़ रहा है।

प्राकृतिक आपदा को न्योता
विशेषज्ञों के अनुसार, जिस तरह से नदियों के गर्भ से अत्यधिक मात्रा में बालू निकाला जा रहा है, उससे नदी का स्वरूप और बहाव मार्ग बदल रहा है। इससे न सिर्फ आस-पास के क्षेत्रों में जल संकट गहराएगा, बल्कि बाढ़, कटाव और भूजल स्तर में गिरावट जैसी गंभीर समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं।
सरकारी राजस्व को नुकसान
बालू खनन से राज्य सरकार को अच्छी-खासी आय होती है, लेकिन जब यह प्रक्रिया अवैध हो जाती है तो सारा पैसा माफियाओं की जेब में चला जाता है। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान होता है, बल्कि सरकार को भी करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है।
भविष्य पर प्रश्नचिन्ह
अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन और सरकार इस गंभीर मुद्दे पर कोई ठोस कार्रवाई करेगी या यूं ही बालू माफिया नदियों को खोखला करते रहेंगे? कौन रोकेगा इन पर काबू? कब होगी इन पर सख्ती? क्या शिल्पांचल की नदियां यूं ही मिट जाएंगी? यह सब फिलहाल भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन अगर समय रहते कोई कठोर निर्णय नहीं लिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।














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