
बर्नपुर : श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय) ने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक (सीएमडी) को पत्र लिखकर बर्नपुर स्थित आईएसपी में श्रमिकों द्वारा किए गए कानूनी हड़ताल के चलते श्रमिकों पर की गई सभी प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयों को तुरंत वापस लेने का आदेश दिया है। यह निर्देश कर्मियों पर हड़ताल के दौरान हुई प्रताड़ना को समाप्त करने के उद्देश्य से जारी किया गया है, जिसमें श्रमिकों पर निलंबन, चेतावनी पत्र, सेवा शर्तों में बदलाव और स्थानांतरण जैसी कठोर कार्रवाइयां सम्मिलित हैं।

मुख्य श्रम आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि बर्नपुर और दुर्गापुर स्टील प्लांट प्रबंधन के विरुद्ध विभिन्न यूनियनों और एसोसिएशनों से प्राप्त शिकायतों के मद्देनजर यह निर्देश जारी किया गया है। शिकायतों में इस बात पर जोर दिया गया है कि श्रमिकों के अधिकारों को संरक्षित किया जाना चाहिए और उनके द्वारा किए गए आंदोलन के परिणामस्वरूप उत्पन्न स्थितियों का दमनकारी नीतियों के तहत शमन नहीं होना चाहिए। आयुक्त ने प्रबंधन को चेतावनी दी है कि सक्रिय कामगारों के खिलाफ की गई सभी प्रकार की प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयों को तत्काल वापस लिया जाए ताकि श्रमिकों को न्याय मिल सके।

आयुक्त ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि श्रमिकों की हड़ताल से उत्पन्न विवाद का मामला अभी मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय) के कार्यालय में लंबित है, इसलिए प्रबंधन द्वारा की गई किसी भी प्रकार की दमनात्मक कार्रवाई औद्योगिक विवाद अधिनियम (आईडी एक्ट) की धारा 33 (1)(ए) का उल्लंघन मानी जा सकती है। इस प्रावधान के तहत लंबित विवादों के दौरान किसी भी पक्ष पर प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करना कानूनन प्रतिबंधित है, और इसके उल्लंघन से प्रबंधन कानूनी उलझनों में फंस सकता है। मुख्य श्रम आयुक्त ने प्रबंधन से यह भी कहा है कि वे इस मामले की गहन जांच कर जल्द ही अपनी कार्रवाई रिपोर्ट इस कार्यालय में प्रस्तुत करें।
इस संदर्भ में, इंटक के प्रमुख नेता हरजीत सिंह ने इस आदेश को श्रमिकों की एक बड़ी जीत बताते हुए कहा कि यह आंदोलन श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और प्रबंधन के दमनकारी कदमों के खिलाफ किया गया एक सशक्त प्रयास था। सिंह ने कहा कि प्रबंधन ने श्रमिकों के आंदोलन को दबाने की नीति अपनाई थी, जो अब इस आदेश के साथ विफल हो गई है। उनके अनुसार, श्रमिकों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया और अंततः सत्य की विजय हुई।
प्रबंधन के खिलाफ यह कदम बर्नपुर के श्रमिक संगठनों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरणास्रोत बन गया है। श्रमिक संघों का कहना है कि इस आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि श्रमिक अधिकारों का उल्लंघन सहन नहीं किया जाएगा और यह हर कर्मचारी के मनोबल को और सुदृढ़ करेगा। यूनियनों ने श्रम मंत्रालय के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे भविष्य में प्रबंधन द्वारा श्रमिकों पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगेगी।
श्रमिक संगठनों का यह भी मानना है कि इस प्रकार के न्यायसंगत निर्णय श्रमिकों में विश्वास को मजबूत करते हैं, जिससे वे संगठनात्मक अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकें। श्रम मंत्रालय द्वारा उठाए गए इस कदम ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि श्रमिक हितों की रक्षा करना प्रशासन का मुख्य कर्तव्य है।















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