
आसनसोल : विगत कई वर्षों से गारुई नदी की सफाई, सुरक्षा और बाढ़ नियंत्रण को लेकर केवल चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन धरातल पर कोई ठोस और स्थायी कदम अब तक नहीं उठाया गया है। प्रशासन, सरकार और आसनसोल नगर निगम की निष्क्रियता का दुष्परिणाम प्रतिवर्ष रेलपार, डिपो-पारा, कल्याणपुर हाउसिंग एरिया, और रेलपार वार्ड संख्या 24 से 29 तक के क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। बरसात के मौसम में यह नदी उफान पर आ जाती है, जिससे आस-पास के मोहल्लों में जलभराव, मकानों में पानी का प्रवेश और जन-धन की हानि जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए स्थानीय प्रशासन द्वारा कुछ अस्थायी उपाय अवश्य किए जाते हैं, जैसे नालों की सफाई, मिट्टी डालना या मोटर पंप लगाना, किंतु यह प्रयास केवल सतही और दिखावटी होते हैं, जो किसी स्थायी समाधान की दिशा में संकेत नहीं करते। हर वर्ष जब मानसून सक्रिय होता है, तब नगर निगम की नींद टूटती है और आनन-फानन में बैठकें की जाती हैं। इन बैठकों में प्रस्ताव, बजट और संभावनाओं की बातें होती हैं, लेकिन जैसे ही वर्षा ऋतु समाप्त होती है, सारा उत्साह और योजना कागज़ों में ही दफन हो जाता है।

रेलपार, कल्याणपुर हाउसिंग एरिया, डिपो-पारा जैसे इलाकों के निवासियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। बाढ़ के समय बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है, बीमार लोग अस्पताल नहीं पहुँच पाते, रोज़गार पर विपरीत असर पड़ता है और लोग दिनों-दिन सरकारी सहायता की ओर निहारते रहते हैं।
प्रशासन द्वारा बार-बार यह तर्क दिया जाता है कि गारुई नदी पर अड्डा क्षेत्र की खदानों से निकले मलवा और कचरे के जमाव के कारण जल प्रवाह अवरुद्ध हो गया है, जिससे नदी की गहराई कम होती जा रही है। वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोग कहते हैं कि सरकार को यदि वास्तव में आम नागरिकों की चिंता होती, तो अब तक नदी की वैज्ञानिक तरीके से सफाई कर दी गई होती और आधुनिक तटबंध बनाकर जलप्रवाह को नियमित कर लिया गया होता।
नगर निगम द्वारा समय-समय पर नाली सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, किंतु उसका प्रभाव ज़मीनी स्तर पर कहीं नज़र नहीं आता। जनप्रतिनिधियों द्वारा केवल आश्वासनों की माला पहनाई जाती है और मीडिया में बयानबाज़ी की जाती है, लेकिन जब जनता को वास्तव में राहत की आवश्यकता होती है, तब सब मौन धारण कर लेते हैं।
नदी के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की पीड़ा अब एक सामूहिक आक्रोश में बदलती जा रही है। स्थानीय सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपे हैं, लेकिन वे भी अब प्रशासनिक उदासीनता के कारण निराश होते जा रहे हैं।

यह प्रश्न अब केवल गारुई की सफाई या बाढ़ नियंत्रण का नहीं रहा, बल्कि यह एक गंभीर प्रशासनिक असफलता और जनविरोधी नीति का प्रतीक बन चुका है। यदि समय रहते कठोर निर्णय नहीं लिए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और भी विकराल रूप ले सकती है।
जनता अब केवल आश्वासन नहीं, समाधान चाहती है। सरकार, नगर निगम और प्रशासन को यह समझना होगा कि गारुई अब जलप्रलय का कारण बन चुकी है और इससे निपटना केवल बैठकों से संभव नहीं है, अपितु ठोस निर्णय और कर्तव्यपरायणता से ही राहत संभव है।














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