

दुर्गापुर : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुक्रवार को दुर्गापुर में हुई जनसभा और सरकारी कार्यक्रम के दौरान एक नाम सबसे अधिक अनुपस्थित रहा—भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और सांसद दिलीप घोष। जबकि यह कार्यक्रम पूरी तरह से पश्चिम बंगाल बीजेपी की एकजुटता और ताकत को दिखाने का मंच माना जा रहा था, जिसमें प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य, केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार, सांसद सौमित्र खां, सांसद ज्योर्तिमय सिंह महतो, लोकसभा सांसद लॉकेट चटर्जी, संगठन प्रभारी सुनील बंसल समेत पार्टी के सभी प्रमुख नेता उपस्थित थे।
लेकिन कार्यक्रम से ठीक पहले शुक्रवार सुबह ही दिलीप घोष दिल्ली रवाना हो गए। जब पत्रकारों ने इस संबंध में सवाल किया तो उन्होंने कहा कि वे पार्टी के कार्य से दिल्ली जा रहे हैं और दिल्ली दौरे की योजना अचानक बनी। हालांकि, दिलीप घोष ने यह भी जोड़ा कि उन्हें प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए पार्टी की ओर से कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं मिला।

इस पूरे घटनाक्रम ने बंगाल की राजनीति को गरमा दिया है। तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और सीपीएम—तीनों ही दल दिलीप घोष की गतिविधियों पर गहराई से नजर बनाए हुए हैं। खासकर तृणमूल कांग्रेस इसे एक संभावित राजनीतिक संकेत के रूप में देख रही है।
इससे पहले, दिलीप घोष तब चर्चा में आए थे जब वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निमंत्रण पर अपनी पत्नी रिंकू मजूमदार के साथ दीघा में आयोजित नवनिर्मित जगन्नाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में पहुंचे थे। यह कार्यक्रम तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में हुआ था और प्रदेश बीजेपी ने इसका बहिष्कार करने की घोषणा की थी। लेकिन घोष ने पार्टी की आधिकारिक लाइन को दरकिनार करते हुए न सिर्फ कार्यक्रम में शिरकत की, बल्कि मंच से मंदिर की सराहना भी की।
अब सवाल उठ रहा है कि क्या दिलीप घोष किसी नई राजनीतिक पारी की तैयारी कर रहे हैं? खासकर तब, जब तृणमूल कांग्रेस 21 जुलाई को धर्मतला में आयोजित शहीद दिवस रैली में कोई बड़ा “राजनीतिक धमाका” करने की तैयारी में है। अटकलें हैं कि घोष की ओर से उस रैली में अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आ सकता है, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

इधर, प्रदेश बीजेपी के नए अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा, “दिलीप घोष बीजेपी में थे, हैं और रहेंगे।” लेकिन सूत्र बताते हैं कि घोष दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से भी मिल सकते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे संगठनात्मक असहमति या उपेक्षा को लेकर उच्च नेतृत्व से संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह घटनाक्रम बंगाल बीजेपी की आंतरिक स्थिति और रणनीतिक असहमति को उजागर करता है। अब निगाहें 21 जुलाई पर टिकी हैं, जब तृणमूल की जनसभा में कोई नई राजनीतिक तस्वीर उभर सकती है।














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