बर्नपुर प्लांट में बाहरी लोगों को प्राथमिकता को लेकर आदिवासी छात्रों का हल्लाबोल,

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आसनसोल :  बेरोजगारी के खिलाफ एक बार फिर आदिवासी युवाओं की आवाज़ बुलंद हुई है। मंगलवार को ‘आदिवासी स्टूडेंट एंड यूथ फोरम’ की अगुवाई में सैकड़ों आदिवासी छात्रों ने आसनसोल स्थित श्रम कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन किया। छात्रों ने नारेबाजी करते हुए स्थानीय उद्योगों, विशेषकर बर्नपुर के स्टील प्लांट (SAIL-ISP), में आदिवासी युवाओं को रोजगार से वंचित करने का आरोप लगाया।

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प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहीं पूर्णिमा हांसदा ने कहा कि उन्होंने बार-बार आवेदन देने के बावजूद प्लांट में नौकरी नहीं मिली। उन्होंने कहा, “मैंने पूरी पढ़ाई पूरी की है, आवेदन भी दिए हैं, लेकिन आदिवासी होने की कीमत मुझे चुकानी पड़ रही है।” उनका आरोप है कि स्थानीय और योग्य होते हुए भी उन्हें बार-बार अनदेखा किया गया।

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फोरम के सदस्यों ने श्रम विभाग को ज्ञापन सौंपते हुए तीन प्रमुख मांगें रखीं: 1. स्थानीय युवाओं को उद्योगों में रोजगार में प्राथमिकता दी जाए।2. आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित पदों को जल्द से जल्द भरा जाए। 3. भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि अगर मांगे नहीं मानी गईं तो आगामी दिनों में वे बड़ा शहरव्यापी आंदोलन करेंगे। उन्होंने कहा कि यह केवल पूर्णिमा हांसदा की नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समुदाय की समस्या है। स्थानीय उद्योगों में बाहरी लोगों को तरजीह देना न केवल असमानता है बल्कि आदिवासी युवाओं के अधिकारों का सीधा हनन है।

बर्नपुर स्थित इस्पात संयंत्र सहित कई अन्य कंपनियों में लंबे समय से आदिवासी युवाओं की उपेक्षा की जा रही है, जबकि वे उसी भूमि पर रहते हैं जहां ये उद्योग स्थापित हैं। फोरम का कहना है कि यह सामाजिक और आर्थिक अन्याय है जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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इस प्रदर्शन के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। कुछ सामाजिक संगठनों और नेताओं ने प्रदर्शनकारियों की मांगों का समर्थन करते हुए सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की है।श्रम विभाग की ओर से ज्ञापन लेने के बाद कोई तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, जिससे छात्रों में असंतोष और अधिक बढ़ गया है।

फिलहाल सभी की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या वह आदिवासी युवाओं के इस आंदोलन की गूंज सुनेगा या फिर आंदोलन की लपटें और तेज होंगी। आदिवासी युवाओं का यह संघर्ष अब रोजगार से आगे सामाजिक न्याय की मांग का रूप ले चुका है।

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