आसनसोल : पश्चिम बंगाल के आसनसोल-रानीगंज कोयला क्षेत्र में वर्ष 2015 से कथित रूप से जारी अवैध कोयला खनन, चोरी और तस्करी का मामला अब देश के बड़े आर्थिक घोटालों में शामिल माना जा रहा है। इस बहुचर्चित मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की जा रही है। शुक्रवार को सामने आई जानकारी के अनुसार ईडी ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 159.51 करोड़ रुपये की अतिरिक्त संपत्तियां अस्थायी रूप से कुर्क की हैं। इसके साथ ही अब तक जब्त की गई कुल संपत्तियों का मूल्य बढ़कर 482.22 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
जांच एजेंसियों के अनुसार यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल के कोल बेल्ट क्षेत्र में अवैध खनन, सरकारी खदानों से कोयले की चोरी और अवैध परिवहन से जुड़ा है। आरोप है कि वर्षों तक संगठित तरीके से कोयले की निकासी कर उसे बाजार में बेचा गया, जिससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान हुआ। अधिकारियों का अनुमान है कि इस घोटाले से सरकार को लगभग 1340 करोड़ रुपये की क्षति पहुंची है।
ईडी की जांच में सामने आया है कि कुछ निजी कंपनियों ने कथित रूप से अवैध रूप से निकाले गए कोयले की खरीद नकद भुगतान के माध्यम से की। इससे अवैध कमाई को वैध कारोबार के रूप में दिखाने का प्रयास किया गया। एजेंसी का दावा है कि इस धनराशि को बाद में विभिन्न निवेश माध्यमों और वित्तीय साधनों में लगाया गया।
कुर्क की गई संपत्तियों में कॉर्पोरेट बॉन्ड, निवेश फंड और अन्य वित्तीय साधन शामिल हैं। इनमें श्याम स्टील एंड पावर लिमिटेड तथा श्याम फेरो अलॉयज लिमिटेड से जुड़े निवेशों का भी उल्लेख किया गया है। जांच एजेंसियों का कहना है कि ये कंपनियां श्याम समूह से संबंधित हैं और वित्तीय लेनदेन की गहन जांच की जा रही है।
मामले की जांच में मुख्य आरोपी के रूप में अनूप माजी उर्फ ‘लाला’ का नाम सामने आया है। ईडी के अनुसार कथित सिंडिकेट उसके नेतृत्व में संचालित होता था। आरोप है कि यह नेटवर्क ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) के पट्टा क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर कोयले की चोरी तथा अवैध खुदाई में शामिल था। एजेंसियों का कहना है कि यह गतिविधि लंबे समय तक संगठित ढंग से चलाई गई।
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि अवैध कोयले के परिवहन के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जाता था। कथित रूप से “लाला पैड” नामक नकली परिवहन चालान तैयार किए जाते थे, जिन पर अस्तित्वहीन कंपनियों के नाम अंकित रहते थे। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर ट्रकों को विभिन्न मार्गों से गुजराया जाता था।
सूत्रों के अनुसार ट्रक चालकों को पहचान संकेत के तौर पर छोटे मूल्य के नोट दिए जाते थे, जिनका उपयोग कोड के रूप में किया जाता था। बाद में वाहन संख्या और नोट की तस्वीरें कथित संचालकों को भेजी जाती थीं। एजेंसियों का आरोप है कि इस सूचना का उपयोग रास्ते में मौजूद संबंधित लोगों तक संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता था, ताकि वाहन बिना बाधा आगे बढ़ सकें।
मामले में हवाला नेटवर्क की भूमिका भी जांच के दायरे में है। ईडी का कहना है कि अवैध कमाई को बैंकिंग निगरानी से बचाने के लिए नकद लेनदेन और संगठित हवाला चैनलों का उपयोग किया गया। धनराशि को विभिन्न माध्यमों से स्थानांतरित कर निवेश में बदला जाता था।
अब तक इस प्रकरण में 50 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया जा चुका है। इनमें कोलियरी अधिकारी, कारोबारी, सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े कुछ कर्मी तथा कथित राजनीतिक संपर्क रखने वाले लोग शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि कई मामलों में आरोप सिद्ध होना अभी बाकी है और न्यायिक प्रक्रिया जारी है।
सीबीआई ने इस मामले की जांच वर्ष 2020 में प्रारंभ की थी। बाद में मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू सामने आने पर ईडी ने भी अलग मामला दर्ज कर जांच शुरू की। वर्ष 2025 में ईडी ने इससे जुड़े मामलों में चार आरोप पत्र दाखिल किए थे, जिनमें कई प्रमुख नाम शामिल हैं।
जांच एजेंसियों का मानना है कि यह मामला केवल आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रशासनिक और संगठित संरक्षण की भी जांच की जा रही है। शुक्रवार को हुई नई कार्रवाई के बाद यह स्पष्ट है कि जांच अभी समाप्त नहीं हुई है और आने वाले समय में और बड़े खुलासे संभव हैं। आसनसोल-रानीगंज कोल बेल्ट का यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

















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