दुर्गापुर : विधानसभा चुनाव से कुछ घंटे पहले पश्चिम बर्धमान की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। चुनावी सरगर्मी के बीच आम जनता उन्नयन पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे चार प्रत्याशियों ने मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया। इस अचानक हुए राजनीतिक परिवर्तन ने जिले के चुनावी समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है।
दुर्गापुर स्थित जिला तृणमूल कांग्रेस कार्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जिला अध्यक्ष नरेंद्रनाथ चक्रवर्ती ने इन नेताओं को पार्टी का झंडा सौंपकर औपचारिक रूप से स्वागत किया। समारोह में बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता उपस्थित रहे और नए शामिल नेताओं का अभिनंदन किया गया।
तृणमूल में शामिल होने वालों में रानीगंज विधानसभा क्षेत्र से राहुल घोष, दुर्गापुर पूर्व से रुबिया बेगम, पांडवेश्वर से जुबेर शेख और बरबनी क्षेत्र से आदित्य दास शामिल हैं। ये सभी नेता चुनाव आयोग के दस्तावेजों में अब भी अपने मूल दल के प्रत्याशी के रूप में दर्ज हैं, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से तृणमूल कांग्रेस का समर्थन घोषित कर दिया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार मतदान से ठीक पहले इस प्रकार का दलबदल बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिन क्षेत्रों से ये उम्मीदवार मैदान में थे, वहां मतों के बंटवारे की संभावना अब बदल सकती है। इससे प्रमुख दलों की रणनीति पर भी प्रभाव पड़ने की चर्चा तेज हो गई है।
कार्यक्रम में जिला अध्यक्ष नरेंद्रनाथ चक्रवर्ती ने कहा कि राज्य सरकार की जनकल्याणकारी नीतियों और मुख्यमंत्री के नेतृत्व से प्रभावित होकर कई लोग तृणमूल कांग्रेस से जुड़ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि यह केवल शुरुआत है और आने वाले समय में और भी लोग पार्टी के साथ आएंगे।
दूसरी ओर, नए शामिल नेताओं ने कहा कि उन्होंने क्षेत्र के विकास, शांति और जनहित को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया है। उनका कहना था कि जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए मजबूत संगठन और प्रभावी नेतृत्व की आवश्यकता होती है, इसलिए उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का साथ चुना।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छोटे दलों के उम्मीदवारों का इस तरह बड़े दल में शामिल होना चुनावी राजनीति का हिस्सा है, लेकिन मतदान से ठीक पहले इसका असर अधिक दिखाई देता है। खासकर उन सीटों पर, जहां मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो, वहां कुछ हजार मत भी निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं।
रानीगंज, पांडवेश्वर, दुर्गापुर पूर्व और बरबनी जैसी सीटों पर पहले से ही कड़ा मुकाबला माना जा रहा है। ऐसे में इन प्रत्याशियों के समर्थन बदलने से कार्यकर्ताओं के मनोबल, स्थानीय वोटरों की सोच और प्रचार रणनीति पर असर पड़ सकता है।
विपक्षी दलों ने इस घटनाक्रम पर सवाल उठाते हुए इसे अवसरवादी राजनीति करार दिया है। उनका कहना है कि चुनावी समय में सिद्धांतों से अधिक लाभ-हानि देखकर फैसले लिए जा रहे हैं। हालांकि तृणमूल समर्थकों ने इसे पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता का प्रमाण बताया है।
मतदान से पहले हुए इस घटनाक्रम ने जिले की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि इन नेताओं के कदम का असर मतदान प्रतिशत और परिणामों पर कितना पड़ता है। फिलहाल पश्चिम बर्धमान में चुनावी मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।

















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