जमुरिया : पश्चिम बर्दवान जिले की महत्वपूर्ण जमुरिया विधानसभा सीट पर चुनावी सरगर्मी लगातार बढ़ती जा रही है। कभी वामपंथी प्रभाव और बाद में तृणमूल कांग्रेस की मजबूत पकड़ वाले इस क्षेत्र में इस बार मुकाबले का केंद्र विकास, रोजगार और जनसंपर्क से अधिक “स्थानीय बनाम बाहरी” का मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक गलियारों से लेकर चाय की दुकानों और मोहल्लों तक इसी चर्चा ने जोर पकड़ लिया है।
भारतीय जनता पार्टी ने इस सीट से डॉ. बिजन मुखर्जी को मैदान में उतारा है। प्रत्याशी घोषित होने के बाद से उनके नाम को लेकर क्षेत्र में व्यापक बहस छिड़ गई है। विरोधी दलों और कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि डॉ. मुखर्जी क्षेत्र के स्थायी निवासी नहीं हैं और चुनाव से ठीक पहले उनकी सक्रियता बढ़ी है। इसी मुद्दे को लेकर विभिन्न स्थानों पर नारेबाजी भी देखने को मिल रही है।
स्थानीय मतदाताओं का एक वर्ग मानता है कि विधायक ऐसा होना चाहिए जो क्षेत्र के लोगों के सुख-दुख में हमेशा साथ खड़ा रहे और लंबे समय से इलाके से जुड़ा हो। उनका कहना है कि जनता अपने बीच के ऐसे प्रतिनिधि को प्राथमिकता देती है जो समस्याओं को निकट से समझता हो। इस भावना को लेकर चुनावी माहौल में “धरती पुत्र” का मुद्दा तेजी से उभरा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस इस भावनात्मक मुद्दे को चुनाव प्रचार में प्रमुखता से उठा रही है। पार्टी प्रत्याशी और वर्तमान विधायक हरेराम सिंह को स्थानीय चेहरा बताकर मतदाताओं के बीच समर्थन मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ता क्षेत्रीय पहचान को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा बना रहे हैं।
दूसरी ओर भाजपा समर्थक इस आरोप को सिरे से खारिज कर रहे हैं। उनका कहना है कि जनसेवा की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। यदि कोई योग्य, शिक्षित और समाजसेवी व्यक्ति जनता की सेवा करना चाहता है तो उसे बाहरी कहकर खारिज करना उचित नहीं है। समर्थकों के अनुसार डॉ. बिजन मुखर्जी चिकित्सक होने के साथ सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे हैं और क्षेत्र के विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं।
भाजपा खेमे का कहना है कि जमुरिया जैसे औद्योगिक क्षेत्र को रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मूल मुद्दों पर चर्चा की आवश्यकता है। उनका आरोप है कि स्थानीय बनाम बाहरी की बहस जानबूझकर असली समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए खड़ी की जा रही है। पार्टी कार्यकर्ता मतदाताओं तक पहुंचकर विकास और बदलाव का संदेश देने में जुटे हैं।
जमुरिया सीट पर मुकाबला आसान नहीं माना जा रहा। यहां तृणमूल कांग्रेस की मजबूत जमीनी पकड़ है, जबकि वामपंथी दलों का भी परंपरागत आधार मौजूद है। भाजपा पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रही है, लेकिन बूथ स्तर पर संगठन को और मजबूत करने की चुनौती अब भी बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भाजपा उम्मीदवार आम मतदाताओं के बीच भरोसा कायम करने में सफल रहते हैं और रोजगार, उद्योग तथा स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से उठाते हैं, तो मुकाबला रोचक हो सकता है। वहीं तृणमूल कांग्रेस स्थानीय पहचान और संगठनात्मक मजबूती के सहारे अपनी बढ़त बनाए रखने की कोशिश में है।
अब सबकी निगाहें मतदान और उसके बाद आने वाले परिणामों पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि जमुरिया की जनता स्थानीय पहचान को प्राथमिकता देती है या विकास के वादों को महत्व देती है। फिलहाल क्षेत्र की गलियों में चुनावी चर्चा अपने चरम पर है और हर दल जीत का दावा कर रहा है।

















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