आसनसोल : पश्चिम बर्धमान जिले के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मां घाघर बुढ़ी मंदिर में शनिवार को श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच 40वें श्री श्री फलहारिणी कालिका पूजा महोत्सव का विशेष आयोजन किया गया। काली पहाड़ी धर्म चक्र सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित इस चार दिवसीय महोत्सव के दौरान शनिवार को पारंपरिक विधि-विधान के साथ कुमारी पूजा संपन्न हुई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
मां घाघर बुढ़ी मंदिर परिसर सुबह से ही भक्तिमय माहौल में डूबा रहा। मंदिर को आकर्षक विद्युत सज्जा, पुष्पों और धार्मिक अलंकरणों से सजाया गया था। श्रद्धालु सुबह से ही पूजा-अर्चना के लिए मंदिर पहुंचने लगे थे। कुमारी पूजा के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच बालिकाओं को देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की गई। इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने मां कालिका से सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, फलहारिणी कालिका पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। यह पूजा साधना, शक्ति आराधना और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक मानी जाती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां कालिका की आराधना से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा परिवार में सुख-समृद्धि आती है। इसी आस्था के कारण महोत्सव में दूर-दराज के क्षेत्रों से भी भक्त पहुंच रहे हैं।
समारोह के दौरान समिति के संस्थापक राधा गोविंद सिंह, अध्यक्ष रूपेश कुमार साव तथा सचिव डॉ. दीपक मुखर्जी सहित समिति के अनेक पदाधिकारी और सदस्य उपस्थित रहे। आयोजन को सफल बनाने में श्याम लाल बोधवानी, जितेंद्र केवट, मदन ठाकुर, अजय सिंह, विकास सिंह, मिथिलेश पांडेय ‘लल्टू’, नयन रॉय और अमरदीप सहित अन्य सदस्यों ने सक्रिय भूमिका निभाई।
समिति की ओर से बताया गया कि 14 मई से प्रारंभ हुआ यह महोत्सव 17 मई तक चलेगा, जिसमें प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था भी की गई है। मंदिर परिसर में सुरक्षा, स्वच्छता और प्रसाद वितरण की समुचित व्यवस्था देखने को मिली।
शनिवार को आयोजित कुमारी पूजा के दौरान महिलाओं और युवाओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया। पूरे क्षेत्र में धार्मिक उल्लास और सांस्कृतिक एकता का वातावरण बना रहा। शाम के समय भजन-कीर्तन और आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए, जिससे पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से गूंज उठा।
धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस महोत्सव ने एक बार फिर आसनसोल की सांस्कृतिक परंपराओं और सामुदायिक सौहार्द को जीवंत कर दिया।

















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