आसनसोल : नुनिया नदी के तट पर स्थित घाघर बुड़ी मां का मंदिर आसनसोल की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ा है। लगभग पांच शताब्दी पुराना यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था, विश्वास और लोकपरंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मां के प्रति भक्तों की गहरी श्रद्धा के कारण वर्षभर यहां दर्शन-पूजन के लिए लोगों का आना-जाना लगा रहता है।

जंगल के बीच हुई थी मां की स्थापना
स्थानीय मान्यता के अनुसार करीब पांच सौ वर्ष पहले वर्तमान आसनसोल क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था। इसी क्षेत्र में एक निर्धन ब्राह्मण विधवा कंगालिनी चक्रवर्ती अपने तीन पुत्रों के साथ रहती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी और जीवन-यापन के लिए उन्हें भिक्षा पर निर्भर रहना पड़ता था।
लोककथा के अनुसार एक दिन कंगालिनी को भिक्षा में कुछ नहीं मिला। निराश होकर वह नुनिया नदी के किनारे नीम के वृक्ष के नीचे बैठ गईं। चिंता और थकान के बीच उन्हें नींद आ गई। इसी दौरान उन्होंने एक वृद्धा का स्वप्न देखा, जिन्होंने घाघरा धारण कर रखा था।
मान्यता है कि स्वप्न में उस वृद्धा ने स्वयं को देवी चंडी बताते हुए कंगालिनी को तीन शिलाएं प्रदान कीं। देवी ने निर्देश दिया कि इन शिलाओं की नियमित पूजा की जाए। इसके बाद वह वृद्धा अदृश्य हो गईं।
सुबह कंगालिनी ने जब आंखें खोलीं तो उनके समीप तीन शिलाएं रखी थीं। उन्होंने उन्हें देवी का स्वरूप मानकर सिंदूर, पुष्प और श्रद्धा के साथ पूजा प्रारंभ कर दी। यहीं से घाघर बुड़ी मां की पूजा-परंपरा प्रारंभ होने की मान्यता है।
पीढ़ियों ने संभाली पूजा की परंपरा
कंगालिनी के निधन के बाद उनके पुत्रों ने पूजा की जिम्मेदारी संभाली। स्थानीय विश्वास है कि समय के साथ परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहतर होती गई। धीरे-धीरे मां की महिमा की चर्चा आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगी और श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती चली गई।
समय बीतने के साथ यहां मंदिर का निर्माण कराया गया। आज यह स्थान केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आसनसोल की लोकआस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है।

वैष्णव और शाक्त परंपरा का समन्वय
मंदिर की विशेषता यहां होने वाली पूजा-पद्धति भी है। श्रद्धालुओं के अनुसार मां की आराधना वैष्णव और शाक्त दोनों परंपराओं के अनुरूप की जाती है। मां को चंडी तथा वैष्णवी स्वरूप में पूजने की परंपरा यहां दिखाई देती है।
पूजा के दौरान मां को पुष्पों से सजाया जाता है और विभिन्न प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मां के दरबार में पहुंचते हैं और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं।
माघ में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
हर वर्ष माघ महीने की पहली तिथि पर मंदिर परिसर में विशेष पूजा और मेले का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर आसनसोल सहित आसपास के क्षेत्रों और दूरदराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। पूरे परिसर में धार्मिक उत्साह का वातावरण रहता है और मां के जयकारों से क्षेत्र गूंज उठता है।
स्थानीय लोगों के लिए घाघर बुड़ी मां का मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा की धरोहर है। बदलते समय के बावजूद मां के प्रति श्रद्धा कायम है। यही कारण है कि नुनिया नदी के किनारे स्थित यह प्राचीन देवस्थल आज भी हजारों लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।















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