
असनसोल : आसनसोल के गिरजा मोड़ पर लक्ष्मी पूजन की पूर्व संध्या पर श्रद्धालुओं में उत्साह की गूंज सुनाई दे रही है। शरद ऋतु के इस पावन अवसर पर माता लक्ष्मी के प्रति अटूट आस्था का प्रदर्शन करते हुए यहाँ के विभिन्न मूर्तिकारों ने देवी लक्ष्मी की प्रतिमाओं को अद्भुत भव्यता के साथ अलंकृत किया है। इस धार्मिक उल्लास के बीच, मूर्तिकारों का आत्मसंघर्ष भी प्रकट होता है, जिनके द्वारा निर्मित मूर्तियाँ केवल सौंदर्य का प्रतीक ही नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व का साधन भी हैं।विगत कुछ दिनों की निरंतर वृष्टि ने मूर्तिकारों के कष्टों को और भी गहन कर दिया। कच्ची मिट्टी से गढ़ी जाने वाली ये प्रतिमाएँ बारिश की भीषणता के कारण बार-बार नष्ट होती रहीं, जिससे मूर्तिकारों को अत्यधिक श्रम, समय एवं संसाधनों का पुनः पुनः निवेश करना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप, उनकी आर्थिक स्थिति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मूर्तिकार समुदाय की ओर से यह अभिलाषा प्रकट की जा रही है कि देवी लक्ष्मी की प्रतिमाएँ सुसज्जित स्वरूप में विक्रय हो जाएँ,

जिससे उनकी आजीविका का संवर्धन हो सके।बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा में दुर्गा पूजा के समाप्त होने के कुछ ही दिन पश्चात लक्ष्मी पूजा का आगमन होता है। इसे स्थानीय बंगाली समाज विशेष श्रद्धा एवं भक्ति के साथ सम्पन्न करता है। दुर्गा पूजा की उन्मुक्त रंगीनता के पश्चात लक्ष्मी पूजन एक संयमित उल्लास का प्रतीक बनकर आता है, जहाँ माता लक्ष्मी के आशीर्वाद के प्रति भावभीनी प्रार्थनाएँ की जाती हैं। लक्ष्मी पूजन में शांति एवं समृद्धि की कामना की जाती है और यह विश्वास किया जाता है कि माता लक्ष्मी की कृपा से घर-परिवार में ऐश्वर्य एवं शांति का स्थायी निवास हो। गिरजा मोड़ पर स्थापित अनेक प्रतिमा-निर्माण स्थलों पर देवी लक्ष्मी के विभिन्न रूपों का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया गया है। इन सजीव प्रतिमाओं में मूर्तिकारों की कला की उत्कृष्टता को स्पष्ट देखा जा सकता है। यह परिश्रम एवं निष्ठा का परिणाम है कि हर प्रतिमा में माता लक्ष्मी की ममतामयी दृष्टि, उनकी कृपा एवं आभा का प्रतिबिंबित स्वरूप प्रकट हो रहा है।श्रद्धालुओं के मन में इस पूजा के प्रति न केवल आध्यात्मिक अनुभूति, बल्कि सामाजिक सहभागिता का भाव भी प्रबल होता है। आसनसोल में लक्ष्मी पूजन का यह अवसर प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक सुख-समृद्धि की मंगलकामना के साथ आता है।
















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