
असनसोल : असनसोल के बर्नपुर क्षेत्रांतर्गत अमबागान-तेंतुलतला निवासियों में दशकों तक दुर्गापूजा का वैभव न होने के कारण उनके ह्रदयों में विषाद व्याप्त था। समीपवर्ती क्षेत्रों में जब दीपमालाओं की ज्योति छिटकती और दुर्गा आराधना की गूँज सुनाई देती, तब इस बस्ती में निराशा का अंधकार गहराता। आरंभिक वर्षों में पड़ोस के क्षेत्रों में जाकर देवी का दर्शन करना होता था, किन्तु वहां के औपचारिक दृश्य भी उनकी भावनाओं को संतोष नहीं दे पाते थे। इस स्थिति को परिहार करने हेतु लगभग दस वर्षों पूर्व यहाँ की स्त्रियों ने ह्रदय के अपूर्व उत्साह के साथ इस पर्व का आयोजन करने का संकल्प लिया।

इस पवित्र कार्य में पुरुषों ने भी साहाय्य का हाथ बढ़ाया, किन्तु यहां की दुर्गापूजा का मुख्य सूत्र संचालन महिला मंडली के हाथ में ही निहित है। सीमित चंदे की राशि से होने वाला यह आयोजन भले ही भौतिक सजावट से रिक्त हो, किन्तु इसकी आत्मिक ऊर्जा अनमोल है। प्रत्येक विधि-विधान का यथासंभव अनुसरण कर पूजा सम्पन्न होती है, और विशेष रूप से विजयादशमी के अवसर पर सिन्दूर खेला का उल्लास सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। बस्ती की स्त्रियों के चेहरे पर इस उल्लास का अनूठा मिश्रण दृष्टिगोचर होता है, मानो होली के रंगों का एक दिव्य-रंगीन चित्र साकार हो उठा हो।इस पर्व का एक विशिष्ट आकर्षण यह भी है कि पूरे पूजा अवधि में महिला सदस्य अपने-अपने गृहों में भोजन निर्माण से निवृत्त रहती हैं। चार दिनों तक समस्त सदस्य पूजा स्थल पर सामूहिक भोज का आनंद लेते हैं, जिससे यह उत्सव एक अत्यंत भावविभोर और एकात्मक अनुभव का सृजन करता है। पूजा के उपलक्ष्य में तृप्ति, चाइना, तंद्रा, सुमिता, छाया, राखी, सोमा, मितु, सोनाली, बर्नाली, रिंकु, मुनमुन जैसे महिला समिति के सदस्य अनवरत तत्परता के साथ आयोजन में संलग्न रहते हैं।पूजा कमिटी की मुख्य संयोजिका सोनाली मुखर्जी ने कहा, “हम अपने सीमित साधनों से इस पावन आयोजन को संपन्न करते हैं। यदि हमें सरकारी सहायता प्राप्त हो सके, तो इस महोत्सव को और भी विशालता दी जा सकती है।” इसके निमित्त समिति ने प्रशासनिक अधिकारियों से विनम्र निवेदन किया है।आगामी वर्ष में प्रशासनिक सहकार्यता की संभावना बनी हुई है, किन्तु यह देखना अत्यंत रोचक रहेगा कि सरकारी सहायता इस अनूठे पर्व के प्रति कितनी तत्परता प्रदर्शित करती है।
















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