
आसनसोल : भाजपा नेता सह पूर्व मेयर जितेंद्र तिवारी नें शोशल मिडिया पर पोस्ट कर अपनी आवाज़ बुलंद की है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक स्वार्थ के चलते एक विशेष समुदाय का तुष्टिकरण लंबे समय से हो रहा है, लेकिन इन दलों के लिए भारतीयता और संस्कृति के मूल्यों का तिरस्कार कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ वर्षों से रामनवमी के जुलूसों और दुर्गा पूजा पंडालों को लेकर विवादित बयान दिए गए हैं। अब तो बात यहां तक आ पहुंची है कि प्रकृति पूजा के प्रतीक छठ पूजा को पर्यावरण के लिए खतरा बताकर निशाना बनाया जा रहा है।
यह स्पष्ट है कि राजनीतिक लाभ के लिए कुछ दलों का नैतिक स्तर इतना गिर चुका है कि वे इस देश की सनातन संस्कृति के महत्व को भी भूल चुके हैं। छठ पूजा जैसे पर्व, जो न केवल हमारी धार्मिक आस्था बल्कि सामाजिक एकता और पर्यावरण-संरक्षण का संदेश देते हैं, इनका विरोध करके वे भारत की मूल पहचान को ठेस पहुंचा रहे हैं।

छठ पूजा भारत के पूर्वी और उत्तरी हिस्सों—बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों—में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण त्योहार है। ये लोग जब पश्चिम बंगाल आए, तो केवल रोजगार की तलाश में नहीं, बल्कि अपने संस्कार और संस्कृति के साथ आए। बंगाल की प्रगति में अपने खून-पसीने से योगदान देकर उन्होंने यहां की संस्कृति को भी समृद्ध किया और उसे नए आयाम दिए। बंगाली और पूर्वी संस्कृतियों का यह मेलजोल सामाजिक सद्भाव का एक उदाहरण है।
छठ पूजा सूर्य देवता और छठी मैया की आराधना का पर्व है, जिसमें उगते और डूबते सूर्य दोनों को अर्घ्य देकर यह संदेश दिया जाता है कि जीवन में सफलता और संघर्ष दोनों का सम्मान जरूरी है। यह अस्ताचलगामी सूर्य को पूजने वाला एकमात्र पर्व है, जो हमें सिखाता है कि हर चुनौती का भी अपना महत्व है।
छठ पूजा में सूर्य की किरणों को जल के माध्यम से अर्घ्य दिया जाता है, जिसे वैज्ञानिक रूप से स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना गया है। यह पर्व सूर्योपासना और जल चिकित्सा का अद्भुत संगम है, जो मानसिक और शारीरिक शुद्धि का संदेश देता है। व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास रखकर संयम और आत्म-नियंत्रण का उदाहरण पेश करते हैं।

इस पर्व के दौरान लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है, जो सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए रखते हैं। जाति, धर्म और वर्ग से परे सभी लोग समानता और एकता के साथ मिलकर इस पर्व को मनाते हैं। यह सामूहिकता और सहयोग का अद्भुत उदाहरण है, जिसमें व्रतियों की सेवा से लेकर घाटों की सफाई तक पूरा समाज योगदान देता है।
छठ पूजा में स्त्री-पुरुष भेदभाव नहीं होता। पुरुष भी उतनी ही निष्ठा से उपवास रखते हैं जितनी महिलाएं, जो समानता और आपसी सम्मान का संदेश देता है। इस पर्व के माध्यम से परिवार के सदस्य एकत्र होते हैं, जिससे पारिवारिक और सामाजिक संबंध और मजबूत होते हैं। साथ ही, यह पर्व जल, वायु और प्रकृति के तत्वों के प्रति सम्मान का भाव सिखाता है, जिससे पर्यावरण-संरक्षण का संदेश भी मिलता है।
जो लोग छठ पूजा जैसे पवित्र पर्व का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि संस्कृति और आस्था पर प्रहार केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए उचित नहीं है। इस पर्व को पर्यावरण के लिए खतरा बताना मात्र एक बहाना है, जबकि सच्चाई यह है कि छठ पूजा के आयोजन में नदी, तालाब और जलाशयों की सफाई की परंपरा शामिल है, जो पर्यावरण-संरक्षण को बढ़ावा देती है। ऐसे में विरोध करने वालों को अपनी संकीर्ण सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए।
भारत की संस्कृति और पहचान को चोट पहुंचाने का दुस्साहस करने वाले यह न भूलें कि यह आस्था केवल किसी व्यक्ति या समाज का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। यदि कोई इसे तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए अपमानित करने का प्रयास करेगा, तो जनता इसका करारा जवाब देगी। हमारी संस्कृति और परंपराएं केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता और मानवीय मूल्यों का आधार हैं। छठ पूजा का विरोध केवल एक पर्व का विरोध नहीं, बल्कि भारतीयता पर प्रहार है, जिसे देशवासी किसी भी कीमत पर सहन नहीं करेंगे।
छठ पूजा न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है, बल्कि सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण-संरक्षण और मानवीय मूल्यों का प्रतीक है। जो लोग इसे राजनीतिक हथियार बना रहे हैं, वे अपनी स्वार्थी मंशा के कारण समाज में विद्वेष फैला रहे हैं। ऐसे लोगों को स्पष्ट संदेश है कि भारतीय संस्कृति पर किए गए किसी भी प्रहार का दृढ़ प्रतिकार किया जाएगा।















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