नई दिल्ली : भारतीय न्यायिक व्यवस्था में पत्रकारिता के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने एक युगांतकारी निर्णय दिया है। अब कोई भी प्रशासनिक अथवा पुलिसीय इकाई किसी पत्रकार को उनके गुप्त सूत्रों के अनावरण हेतु बाध्य नहीं कर सकेगी। यह आदेश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) एवं अनुच्छेद 22 के तहत पत्रकारों की स्वतंत्रता एवं गोपनीयता की रक्षा को सुनिश्चित करता है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: प्रेस स्वतंत्रता का मूलाधिकार अटल
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि सूत्रों की गोपनीयता मीडिया की निर्बाध स्वतंत्रता का आधार स्तंभ है, जिसे किसी भी परिस्थिति में भंग नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने 1978 के प्रेस स्वतंत्रता अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि पत्रकारों पर किसी भी प्रकार का दबाव डालकर उनके स्रोतों की जानकारी प्राप्त करना संविधान-सम्मत नहीं है।
पत्रकार समुदाय में हर्ष, मीडिया अधिकारों को बल
इस ऐतिहासिक फैसले से पत्रकार संगठनों एवं वरिष्ठ मीडियाकर्मियों में हर्ष का माहौल है। कई पत्रकारों ने इसे लोकतंत्र की रक्षा में मील का पत्थर करार दिया। मीडिया संगठनों का मानना है कि यह निर्णय पत्रकारों की स्वायत्तता को सुदृढ़ करेगा और सरकारी हस्तक्षेप को रोकेगा।
पत्रकारिता जगत में नया परिदृश्य, सुरक्षा की मांग
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद पत्रकारिता जगत में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है। कई मीडिया संगठनों ने सरकार से अपील की है कि पत्रकारों की सुरक्षा को और मजबूत किया जाए तथा मीडिया पर किसी भी प्रकार के अनावश्यक दबाव को समाप्त किया जाए।
यह निर्णय भारतीय पत्रकारिता इतिहास में स्वर्णिम अध्याय जोड़ने वाला है, जो प्रेस स्वतंत्रता के अधिकारों को संवैधानिक संबल प्रदान करता है और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को और अधिक सशक्त करता है।















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