
आसनसोल : रामनवमी की पावन प्रभात में जब सम्पूर्ण राष्ट्र ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गुंजायमान हो रहा था, उसी क्षण भारत की दो प्रमुख इस्पात नगरी—बर्नपुर एवं बोकारो—अपने भाग्य-पथ पर दो विपरीत दिशाओं की ओर अग्रसर हो रही थीं।
बर्नपुर में आईएसपी के पांच ऐतिहासिक हाइपरबोलिक कूलिंग टावरों का विधिवत विसर्जन कर औद्योगिक विरासत को नम आँखों से विदाई दी गई। यह केवल स्थापत्य संरचनाएँ नहीं थीं, अपितु श्रमिकों के श्रम, तप, एवं आत्मसमर्पण की जीवंत साक्षी थीं। वरिष्ठ तकनीशियनों ने इन्हें ‘रामसेतु’ की संज्ञा दी, जो अतीत को भविष्य से जोड़ते रहे। सुरक्षा और उत्पादन बाधा को दृष्टिगत रखते हुए इनका नियंत्रित ध्वंस आवश्यक हो गया था। परंतु इस ध्वंस में भी नव सृजन की चेतना अन्तर्निहित रही — ₹40,000 करोड़ की औद्योगिक परियोजना, विश्व का सर्ववृहत्तम ब्लास्ट फर्नेस, एवं बर्नपुर को ‘ग्रैंड स्टील सिटी’ के रूप में रूपांतरित करने की महाकल्पना आकार ग्रहण कर रही है।

वहीं दूसरी ओर, बोकारो की वायुमंडलीय दशा भिन्न थी। अप्रेंटिस पद से विस्थापित युवाओं की नियोजन मांग को लेकर आरंभ हुआ शांतिपूर्ण प्रदर्शन, प्रशासनिक लाठीचार्ज एवं युवक प्रेम महतो की मृत्यु के उपरांत उग्र आंदोलन में परिणत हो गया। सम्पूर्ण नगर बंद, बैंक, विद्यालय, चिकित्सालय निष्क्रिय, तथा बीएसएल संयंत्र के समस्त द्वार अभिरुद्ध हो गए। पाँच सहस्त्र से अधिक कर्मी संयंत्र में ही अवरुद्ध रह गए।

धरनास्थल पर एक युवक की हुंकार गूंजी — “हमें सहानुभूति नहीं, नियोजन चाहिए!” मृतक परिजनों को ₹50 लाख मुआवजा, आश्रित को नौकरी एवं 1500 अप्रेंटिस की नियुक्ति की मांग की गई, पर त्रिपक्षीय वार्ता विफल रही।

विरोधाभास देखिए — यह दिन भी रामनवमी था, जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों की सर्वाधिक आवश्यकता प्रतीत हुई। एक ओर बर्नपुर में दीप प्रज्वलित कर उज्ज्वल भविष्य का स्वागत हुआ, तो दूसरी ओर बोकारो की गलियों में न्याय हेतु कैंडल मार्च निकला। एक बालक के हाथ में राम का चित्र था, जिसने अपने पिता से सुना था — “राम अन्याय के विरुद्ध लड़े थे… हमें भी लड़ना होगा।”
यह रामनवमी दो लौहनगरियों में दो यथार्थों की कथा बनकर इतिहास में अंकित हो गई।














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