
बर्नपुर : देश के इस्पात इतिहास में अपनी विशिष्ट छवि रखने वाले बर्नपुर इस्पात संयंत्र के शताब्दी प्राचीन हाइपरबोलिक कूलिंग टावर अब इतिहास के गर्त में समाने को अग्रसर हैं। आईएसपी (इंडियन स्टील प्लांट) के अत्याधुनिक 4.2 मिलियन टन क्षमता वाले इस्पात संयंत्र के विस्तार हेतु इन ऐतिहासिक संरचनाओं का ध्वस्तीकरण अनिवार्य रूप से प्रारंभ किया गया है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत शहरवासियों को समुचित सावधानी बरतने का परामर्श दिया गया है तथा सुरक्षा के निमित्त अस्थायी रूप से विद्युत आपूर्ति को भी बाधित रखने की योजना बनाई गई है।

सन् 1911 से 1917 के मध्य निर्मित ये पांच हाइपरबोलिक कूलिंग टावर आधुनिक भारतीय इस्पात उद्योग की आधारशिला माने जाते हैं। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक बीरेन मुखोपाध्याय की दूरदृष्टि और इंग्लैण्ड में प्राप्त शिक्षाओं के आलोक में इन टावरों की परिकल्पना साकार हुई थी। इनका उद्देश्य इस्पात निर्माण में उत्पन्न उष्ण जल को शीतल करना था। स्थापत्य की दृष्टि से ये टावर उस युग की अभूतपूर्व तकनीकी क्षमता का प्रतिरूप माने जाते हैं।

वर्तमान में, इन टावरों के ध्वस्तीकरण हेतु विदेशी विशेषज्ञों की देखरेख में समस्त पूर्वाभ्यास पूर्ण कर लिया गया है। प्रशासन, अग्निशमन दल तथा सुरक्षा एजेंसियां सतर्कता की उच्चतम सीमा पर कार्यरत हैं। सुरक्षा घेरा कड़ा कर दिया गया है, ताकि किसी भी प्रकार की जनहानि या सम्पत्ति हानि की संभावनाएं न्यूनतम रहें।

सूत्रों के अनुसार, विशेषज्ञों को इस ऐतिहासिक विध्वंस के लिए 25 करोड़ रुपये की धनराशि प्रदान की गई है। इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने हेतु मीडिया प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है। यद्यपि समय का प्रवाह सब कुछ अपने भीतर समाहित कर लेता है, तथापि इन टावरों से जुड़ी स्मृतियां एवं भावनाएं सदैव जीवित रहेंगी। यह ध्वस्तीकरण केवल एक संरचना का अंत नहीं, अपितु तकनीकी विकास की एक नई भूमिका का आरंभ है।














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